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आला हज़रत का उर्स: मर्दों को हिदायत है औरतों को साथ ना लाएं

फ़ैसल फ़रीद | Updated on: 5 November 2016, 8:00 IST
QUICK PILL
  • औरतों पर पाबंदी को लेकर जारी किया गया फ़रमान बरेलवी मुसलमान और उनके सालाना उर्स में बदमज़गी पैदा कर सकता है. 
  • आयोजकों ने कहा है कि हम अपनी ज़िंदगी इस्लामिक शरिया के हिसाब से जी रहे हैं और इसमें किसी तरह की दख़लअंदाज़ी मंजूर नहीं है. 
  • इस बार के सालाना उर्स में तीन तलाक़ की प्रथा और समान नागरिक संहिता पर भी तीखी बहस होने के आसार बन रहे हैं. 

बरेली में हर साल धूमधाम से मनाया जाने वाला उर्स शुरू होने से पहले ही सियासी रंग में डूब गया है. इस बार यहां तीन तलाक़ की प्रथा बचाने के लिए तक़रीरें की जाएंगी. समान आचार संहिता की पुरज़ोर मुख़ालिफ़त होगी. इन सबसे बढ़कर, औरतों के लिए हुक़्म है कि वे उर्स में शामिल होने की कोशिश न करें. मर्दों को हिदायत दी गई है कि वे अपने-अपने घर की औरतों की निगरानी करें ताकि वे आला हज़रत की दरगाह पर ना पहुंच जाएं. 

बरेली स्थित आला हज़रत की दरगाह सुन्नी मुसलमानों के एक पंथ का आस्था केंद्र है. आमतौर पर इन्हें बरेलवी मुसलमान के नाम से जाना जाता है. यहां लगने वाला सालाना उर्स इन मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा तीर्थ है. आला हज़रत के पड़पोते मौलाना तस्लीम रज़ा ख़ान कहते हैं कि इस्लाम में औरतों को दरगाहों-मज़ारों पर जाने की इजाज़त नहीं है. इस्लामिक शरिया के नाते ही औरतें यहां नहीं आ सकतीं. वैसे भी उनके लिए सबसे बेहतर जगह घर है. बेवजह उन्हें बाज़ार में भी नहीं जाना चाहिए. 

पाबंदी का पोस्टर

हर साल 24 से 26 नवंबर तक चलने वाले इस उर्स में तक़रीबन 10 लाख़ ज़ायरीन शिरक़त करते हैं. इनमें अफ्रीका, यूरोप के मुल्क़ों से आने वाले श्रृद्धालु भी शामिल हैं मगर यहां औरतों को इजाज़त नहीं है. मौलाना तस्लीम रज़ा ख़ान कहते हैं कि कुछ दूसरे जलसों में हम औरतों को जाने की इजाज़त देते हैं लेकिन वे दरगाहों पर नहीं जा सकतीं. 

आयोजन समिति उर्स में होने वाले जलसों से जुड़ा एक पोस्टर भी जारी करती है. उस पोस्टर पर भी साफ़-साफ़ लिखा है कि उर्स में औरतों को इजाज़त नहीं है. मौलाना ने कहा कि इस वक्त देश में मुसलमान औरतों और उनसे जुड़े मुद्दों पर बहस चल रही है लेकिन हम अपने फ़ैसले पर क़ायम हैं. उसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता. 

तीन तलाक़ का समर्थन

मौलाना तस्लीम ने कैच न्यूज़ से कहा है इस बार उर्स में तीन तलाक़ की प्रथा का समर्थन और समान आचार संहिता का विरोध किया जाएगा. हम कुछ नया कैसे स्वीकार कर सकते हैं जो हमारे मज़हब के ही ख़िलाफ़ है. अगर यह सरकार हमारे निजी मामलों में दख़ल करके कुछ भी बदलाव करेगी तो हम अगली सरकार में उसे पलटवा देंगे. 

सुन्नी मुसलमानों में देवबंदी और बरेलवी दो महत्वपूर्ण पंथ हैं. देवबंदी इससे पहले ही तीन तलाक़ की प्रथा का समर्थन कर चुके हैं. अब दूसरे पंथ बरेलवियों ने भी इसकी मुख़ालिफ़त शुरू कर दी है. वहीं केंद्र सरकार पहले ही तीन तलाक़ की प्रथा को ख़त्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल कर चुकी है. 

तस्लीम रज़ा ख़ान पिछले साल उस वक़्त सुर्ख़ियों में आए जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की थी. उन्होंने कहा, 'मैं प्रधानमंत्री से वक़्फ की संपत्ति और वक़्फ बोर्ड से जुड़े मामलों को लेकर मिला था. हमारी सुनवाई भी हुई है और तमाम बोर्डों में बरेलवी मुसलमानों को जगह दी गई है. जल्द ही यह संख्या बढ़ने की संभावना है'.

First published: 5 November 2016, 8:00 IST
 
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