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गौ-टैक्स और 'आज़ादी आंदोलन': गाय की राजनीति के लिए भाजपा के नए औजार

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 April 2017, 10:54 IST

 

राजस्थान में गाय की रक्षा के लिए भारी उत्साह अब सिर्फ अपराधियों में ही नहीं है. राज्य सरकार भी उनके इस उत्साह में बराबरी से प्रतिस्पर्धा करती दिख रही है. हाल ही में स्वघोषित गौ—रक्षकों ने अलवर में एक डेरी किसान की हत्या कर दी थी, अब राज्य सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर राज्य में गौ टैक्स या काउ सेस लिए जाने की घोषणा कर दी है. यह उपकर बुनियादी रूप से राज्य में “गाय और उसकी संतानों की रक्षा तथा उसकी वंश वृद्धि” के लिए लगाया गया है.

राज्य सरकार ने 31 मार्च को जारी अधिसूचना में गौ संरक्षण और संवर्धन के लिए स्टॉप ड्यूटी पर 10 प्रतिशत सरचार्ज वसूले जाने की घोषणा कर दी. यह उपकर उन सभी दस्तावेजों पर लागू होगा जो कि राजस्थान स्टाम्प अधिनियम, 1998 के शिड्यूल में सेक्शन 3 के अंतर्गत आते हैं.

इस कदम की घोषणा पिछले महीने पेश किए गए बजट में की गई थी, जो कि 1 अप्रैल से शुरू नये वित्त वर्ष से प्रभावी हो गई. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह सेस पहले से ही कुछ सीमित वस्तुओं पर लगा हुआ था, जिसे अब इस बजट के साथ राजस्थान स्टॉम्प एक्ट के अंतर्गत आने वाले सभी दस्तावेजों पर लगा दिया गया है.

संभवत: देश में राजस्थान ही एक ऐसा राज्य है जहां पहले से ही एक गौ मंत्रालय, जिसके पास अपना एक बजट है. अब नये सरचार्ज का मतलब है कि गाय के संरक्षण और संवर्धन के लिए अतिरिक्त राजस्व उपलब्ध होगा. क्या यही वो बेठौर अति उत्साह नहीं है जिससे मिलने वाले संकेतों से ही आवारा तत्वों को गाय की सेवा की आड़ में अतिरिक्त जोश और गति मिलती है और वे कानून को अपने हाथ में लेने से भी नहीं हिचकते?

संकेतों का खेल


वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अख्लाक की हत्या से भी यही पता चलता है कि गाय की रक्षा का यह उन्माद दरअसल संकेतों का ही एक खेल है. भाजपा और इसके नेता गाय की सेवा को एक सदगुण के रूप में प्रचारित करते हैं और हाशिए पर मौजूद समूह इस कथानक को गाय सेवा से गाय रक्षा में बदल देते हैं, जिसके बाद जल्द ही रक्षा का भाव निगरानी और सतर्कता की गतिविधियों का रूप ले लेता है या देखने को मिलता है भीड़ का गुस्सा. इसके बाद राजनीतिज्ञ हिंसा की निंदा करते तो दिखते हैं पर इस चेतावनी के साथ कि गाय की रक्षा का मंतव्य तो ठीक था.


राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने जिस तरह से अलवर के हमलावरों का बचाव किया कि जो लोग अवैध रूप से जानवरों का परिवहन करते हैं उनका पकड़ा जाना ठीक ही हैं. इसके बाद उन्होंने बस इतना और जोड़ दिया कि किसी को कानून अपने हाथ में लेने का हक नहीं है. उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि पुलिस ने गाय का परिवहन करने वाले लोगों से लीगल दस्तावेज दिखाने को कहा था पर उन्होंने यह नहीं दिखाया.


संकेतों की बात करें तो इस मामले में राज्य की भाजपा सरकार को केंद्र की भाजपा सरकार से बिल्कुल उपयुक्त समय पर बेहद जरूरी समर्थन मिल गया. ऐसे समय में जबकि गाय की रक्षा के मुद्दे पर अलवर में हत्या के मसले पर पूरे देश में शोर मचा हुआ है, संसद में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कहा कि गाय का संरक्षण तो देश के स्वाधीनता आंदोलन का भाग रहा है.


तकनीकी रूप से सीतारमण उत्तर प्रदेश सरकार के सभी प्रकार के बूचड़खानों के विरुद्ध अभियान पर बोल रही थीं, पर इस वक्तव्य का अलवर से जुड़े विमर्श पर भी भारी असर हुआ. संसदीय मामलों के राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने अलवर में किसी तरह की ऐसी घटना होने की जानकारी होने से ही इंकार करते हुए कहा कि हम किसी प्रकार की अराजकता की अनुमति नहीं देते हैं और इसे माफ नहीं किया जाएगा. साथ में उन्होंने यह भी जोड़ना जरूरी समझा कि ऐसा कोई संदेश नहीं जाना चाहिए कि हम गाय के हत्या का समर्थन करते हैं.

दादरी की वापसी


भाजपा नेताओं ने ठीक यही चालबाजियां अख्लाक की हत्या के बाद दिखाई थीं. यूपी के वर्तमान सीएम योगी आदित्यनाथ ने तो उस समय तो हत्यारों पर कार्रवाई के बजाय अख्लाक के परिवार पर गाय हत्या का आरोप लगाए जाने की मांग की थी. कृषि राज्यमंत्री संजीव बालयान ने तो उस समय यह तक कहा था कि अख्लाक ने अकेले ही 150 किलो की गाय को नहीं खा लिया होगा.

तत्कालीन भाजपा विधायक संगीत सोम ने तो उस समय इस क्षेत्र में एक जनसभा को संबोधित करते हुए वहां के हिंदुओं से न्याय के लिए संघर्ष करने का आह्वान भी किया था. दादरी की जांच अब भी पूरी नहीं हुई है. दोषियों को अब भी पहचाना जाना शेष है. जबकि गांव और इसके आसपास के क्षेत्र की एकता आने वाले लंबे समय के लिए नष्ट हो चुकी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गाय निगरानी समूहों को पिछले साल लगाई गई फटकार और उन पर कार्रवाई की बात खाली बयानबाजी तक ही सीमित रही और इससे सभी के सामने पार्टी के दोहरे मानदंड उजागर हो चुके हैं. इसलिए अब कानून क्रियान्वयन एजेंसियों को आगे आकर सख्ती से इस खतरे का सामना करना चाहिए.


सुप्रीम कोर्ट गाय रक्षा निगरानी समूहों पर प्रतिबंध लगाने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है और कोर्ट ने 7 अप्रेल को केंद्र और 5 भाजपा शासित राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, झारखंड और महाराष्ट्र और कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक की सरकारों को नोटिस देकर उनसे जवाब मांगा है. अब सारे देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर हैं.

 

First published: 10 April 2017, 10:54 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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