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बनारस के बुनकर: क्या कुछ दिन आप हमें खाना खिला सकते हैं?

आवेश तिवारी | Updated on: 23 November 2016, 7:55 IST
(पत्रिका )
QUICK PILL
  • दो हफ़्ता गुज़र जाने के बाद बनारस के 74 हज़ार बुनकरों की ज़िंदगी भी लगभग थम-सी गई है. 
  • बाज़ार से ऑर्डर आना बंद हो गया है, कारख़ानों में काम ठप हैं और घरों में चूल्हा बंद होने की कगार पर है. 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय सीट बनारस में शाम आजकल जल्दी ढलती है. सैलानियों का मौसम है लेकिन घाटों पर भीड़ कम है. मंदिरों में भी धक्का-मुक्की भी नहीं हो रही. ऐसा ही हाल बुनकरों के उन कारख़ानों का है जहां तैयार की गई बनारसी साड़ियां दुनिया भर में मशहूर हैं.  बनारस और आस-पास के लाखों लोगों की आजीविका इसी पर निर्भर है.

शादी का मौसम होने के बावजूद बनारस में ना तो साड़ियों की बुनाई हो रही है और न ही उन्हें ख़रीदने वाले मिल रहे हैं. नोटबंदी की अचानक घोषणा से देश के ज़्यातार हिस्सों में कारोबार और लघु उद्योगों पर असर पड़ा है लेकिन बनारस के बुनकरों की हालत कुछ ज़्यादा ही ख़राब है. नोटबंदी का ऐलान हुए दो हफ़्ता गुज़र जाने के बाद बनारस के 75 हज़ार बुनकरों के घर में खाने का संकट हो गया है. 

पूरी तरह से उधार पर टिका बनारसी साड़ी का कारोबार मंदी की मार पहले से झेल रहा था. अब अचानक हुई नोटबंदी ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. हाथ में कैश नहीं होने की बात कहकर करघा कारोबारियों ने बुनकरों को काम देने से मना कर दिया है. जहां कहीं काम की गुंजाइश है भी, तो उधार न चुकता करने की वजह से ताने-बाने की ख़रीदारी नहीं हो पा रही है. 

न काम न आमदनी

62 साल के नजरुल पीली कोठी बनारस के रहने वाले हैं. 12 लोगों के परिवार का पेट हर दिन भरने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की है. वह सुबह 5 बजे से बैंक ऑफ बड़ौदा कैम्पस के अन्दर अलाव के सामने बैठकर बैंक खुलने का इंतज़ार कर रहे हैं.

वह कहते हैं, '15 दिनों से कोई काम नहीं है न ही अंटी में पैसा, क्या आप मेरे परिवार को कुछ वक्त तक रोटी खिला सकते हैं? आसपास मौजूद लोगों के मुताबिक बैंक ऑफ बड़ौदा की इस शाखा में 28 हज़ार बुनकरों के खाते हैं. यहां अब भीड़ इतनी होती है कि सुबह से शाम तक खड़े होने के बाद कुछ नकद हाथ लग जाए तो किस्मत है.

कहां का ताना, कैसा बाना

पत्रिका

बनारसी साड़ी के कारोबारियों को सबसे ज़्यादा परेशानी ताने-बाने की खरीद में आ रही है. औसानगंज के आलमगीर बताते हैं कि कारोबारियों ने रेशम और कपड़ा देना इसलिए बंद कर दिया क्यूंकि हम अभी तक उनका पुराना उधार ही नहीं चुका पाए हैं. हालत यह है कि हमारे बच्चे खाए बिना मर रहे हैं. करघा बंद है और अपना ही पैसा लेने गए तो बैंक वाले स्याही लगा दिए.

आलमगीर बताते हैं कि अचानक गद्दीदारों की ओर से तानी मिलनी बंद हो गई और बाज़ार से उधारी पर बाना भी नहीं मिल पा रहा. उन्होंने कहा कि इस बीच साडिय़ों की मांग में भी कमी आई है. जैतपुरा के बुनकर बिल्लू नवाब कहते हैं जब ऑर्डर नहीं, कच्चा माल नहीं तो हथकरघा चलाएं कैसे? अब तो घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है.

नहीं हैं बैंक खाते

बनारसी साड़ी के इस कारोबार को बेहद नज़दीक से समझने वाले अविनाश तिवारी कहते हैं कि यह संकट भयावह है. उनके मुताबिक बनारस के ज्यादातर बुनकरों के बैंक खाते नहीं हैं. उन्हें हमेशा नगद ही भुगतान किया जाता है. 8 नवंबर की रात जैसे ही नोटबंदी का ऐलान हुआ तो कारोबारियों ने बुनकरों को 500, 1,000 के पुराने नोट थमाना शुरू कर दिया. ऊपर से मुसीबत यह कि उनके पास अपनी जमा पूंजी भी पुराने नोटों में थी.

अविनाश कहते हैं कि बनारसी साड़ी की गद्दियों का हाल भी बुरा है. नगदी की कमी की वजह से बिक्री नहीं है और बुनकरों का भुगतान भी रुका पड़ा है. हैंडलूम बंद हैं, पावरलूम बंद हैं और इनके बिना बनारस भी एक तरह से बंद ही है.

First published: 23 November 2016, 7:55 IST
 
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