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पश्चिमी यूपी: कारख़ानों, मिलों और मंडियों पर कहर, पुरानी करेंसी और उधार ही सहारा

सादिक़ नक़वी | Updated on: 22 November 2016, 7:51 IST
(मानस गुरुंग )
QUICK PILL
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले की पड़ताल बताती है कि ज़मीन पर हालात ठीक नहीं हैं. 
  • दिहाड़ी मज़दूर, किसान और स्थानीय कारोबारियों पर अचानक हुए इस फ़ैसले की तगड़ी मार पड़ी है. 

दिल्ली से 90 किलोमीटर दूर बड़ौत के ख़्वाजा नांगल गांव में सिंडिकेट बैंक की एक शाखा के बाहर करीब 50 ग्रामीण खड़े हैं. सभी बेहद गुस्से में हैं. उनमें से एक विकास चौधरी ने कहा, 'बैंक पांच-पांच दिन बाद कैश दे रहे हैं.' और 70 साल के बुज़ुर्ग कासिम अहमद कहते हैं, 'मैं यहां रोज़ सुबह 6 बजे से लाइन में लग रहा हूं.' 

शुरुआती दिनों में गरीबों और मध्यम वर्ग ने नोटबंदी के फ़ैसले का दिल खोलकर स्वागत किया. इसे वे अमीरों और भ्रष्टाचार पर की गई कड़ी कार्रवाई मानते हैं मगर बाद में करेंसी की कमी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था बिगाड़ दी और लोगों की रोज़ी-रोटी मुश्किल में पड़ गई. बड़ौत का हाल देखकर यह लगता नहीं कि सरकार अब इस फैसले का राजनीतिक फायदा उठा पाएगी क्योंकि हालात में सुधार नहीं दिख रहे. 

पश्चिमी यूपी में एक प्राइवेट बैंक के अधिकारी के मुताबिक, बैंकों में नियमित कैश का महज़ दसवां हिस्सा ही पहुंच रहा है. स्थानीय लघु उद्योग और मंडियां नकद और ग्राहकों के अभाव में बंद हो रही हैं. बहुत बड़ी आबादी की शिकायत है कि बागपत ज़िले के ग्रामीण इलाक़ों में बैंकों की संख्या ठीक है, लेकिन 9 नवंबर के बाद से किसी के पास कैश की नियमित सप्लाई नहीं है. 

नाराज़गी और बेबसी

ख़्वाजा नांगल के बाशिंदों ने कहा, 'हमें रोज़ खाली हाथ लौटना पड़ता है.' एक बुज़ुर्ग जिनकी दोनों टांगे कटी हुई हैं, बैंक से दस-दस रुपए के नोटों की गड्डी लिए बाहर निकले हैं. वह नोटों की गड्डी उलट-पलटकर देख रहे हैं कि कहीं नोट कटे-फटे तो नहीं हैं. वे कहते हैं, 'ये रोज़ाना महज़ 2,000 रुपए दे रहे हैं और उनमें भी फटे नोट निकल गए.' क़तार में खड़ी एक औरत अपनी बेटी की शादी का कार्ड लाई हैं ताकि उन्हें किसी भी तरह शादी के लिए रुपए मिल जाएं. 

एक ग्रामीण ने पूछा, 'अगर रोज़ लाइन में खड़ा होना है, तो भला कोई काम कैसे कर सकता है. उसके घर का चूल्हा कैसे जलेगा? उन्होंने कहा कि सामान्य ग्राहकों को घंटों क़तार में लगने के बावजूद कैश नहीं मिल रहा लेकिन बैंक मैनेजर स्थानीय कारोबारियों और बनियों को चुपचाप कैश दे देते हैं. हालांकि अपने इस आरोप को साबित करने के लिए उनके पास कोई सबूत नहीं था.  

किसान और कारोबारी अरुण तोमर ने बताया कि नोटबंदी के बाद से सिर्फ बागपत ज़िले में 200 करोड़ रुपए जमा हुए हैं और वितरण 5 करोड़ से थोड़ा ज्यादा का हुआ है. मुनेष बरवाला कहते हैं, 'हम किसानों के पास काला धन नहीं है. हम भ्रष्टाचार के विरोध में हैं मगर रोज़-रोज़ के नुकसान और दुश्वारियों की कीमत पर नहीं. वे आगे कहते हैं, 'पहले हमें कहा गया कि सिर्फ एक हफ्ते की बात है. फिर प्रधानमंत्री ने कहा कि 50 दिन लगेंगे. कुछ लोग कह रहे हैं, महीनों लग जाएंगे. ऐसे में हम क्या करें?'

घाटा

सिरसली गांव के पूर्व सरपंच पूछते हैं, 'बैंकों के पास कैश नहीं है तो हम गेहूं और सरसों कैसे बोएं? समितियां और कृषि केंद्र नकद लेते हैं. बीजों की खरीद पर सब्सिडी बैंक खातों में आती है, जिसे हम इन दिनों आसानी से नहीं ले पा रहे हैं. लाइनों में खड़े लोग मर रहे हैं. पैसा नहीं होने से कई भूखे तक रहने को मजबूर हैं.' किसानों का कहना है कि 20 अक्टूबर से 30 नवंबर तक बु्आई के लिए सबसे मुफ़ीद समय होता है. मगर अब बिना कैश के यह संकट गहराने की आशंका है. 

तोमर की फूलवारी के गुलाब दिल्ली के थोक बाज़ार में बिकते हैं. वह कहते हैं, 'गुलाब के फूलों का गुच्छा 8 नवंबर से पहले 200 रुपए तक में बिक जाता था, मगर अब उन्हें महज़ 30 रुपए मिल रहे हैं और वह भी कभी-कभी.' तोमर के मुताबिक वह  ज्यादातर फूल नहीं काट रहे क्योंकि खरीदार ही नहीं हैं. 

तोमर राष्ट्रीय लोक दल से भी जुड़े हुए हैं और उनका गाडिय़ों का एक शोरूम भी है. वह खाली शोरूम की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, 'हम रोज़ाना लगभग 10 मोटरबाइक बेचते थे. अब एक भी नहीं बेच पा रहे. रोजाना 60-70 बाइक की सर्विस करते थे और अब सिर्फ 5-6 आती हैं.' वे आगे कहते हैं, अगर कुछ दिन में हालात नहीं बदले तो हमें शो रूम से वर्करों को हटाना पड़ेगा. जब आमदनी घट गई और हाथ में कैश भी नहीं है तो भुगतान कैसे करूंगा.'

इस इलाक़े के कई लोगों ने कहा कि खेतों पर दिहाड़ी मज़दूर यूं तो 350-400 रुपए में मिलते थे लेकिन अब इससे आधे में भी काम करने को तैयार हैं. अफ़सोस यह कि कैश नहीं होने के नाते हम उन्हें फिर भी मना कर दे रहे हैं. 

बाज़ार थम गया

बड़ौत की स्थानीय मंडियों में साफ नजर आ रहा है कि लेन-देन किस कदर ठंडा है. गुड़ के थोक विक्रेता राहुल गर्ग ने कहा, 'हमने 21 नवंबर से मार्केट बंद करने का फैसला लिया है क्योंकि बिना कैश के कोई धंधा नहीं हो सकता और बैंकों ने हमें कैश देने से मना कर दिया है. हमारी दिक्कत यह है कि गन्ना पेराई की स्थानीय इकाइयों को नकद भुगतान ही करना होता है.' 

गर्ग कहते हैं, 'साल के इन्हीं महीनों में हम कारोबार कर पाते हैं क्योंकि यह पेराई का मौसम है. ऐसे मौसम में नोटबंदी का फैसला लेकर हमारी आदमनी रोक दी गई.' गर्ग को घेरकर खड़े दिहाड़ी मज़दूरों में से एक ने कहा कि हम दशकों से पेराई का काम कर रहे हैं लेकिन बैंक में कभी खाता नहीं रहा. उन्होंने पूछा कि मुझे मजदूरी कैसे मिलेगी? 

इसी दौरान एक अन्य कारोबारी रवींद्र कुमार ने उनकी बात काटते हुए कहा कि ये सारी शिकायतें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बदनाम करने की साज़िश हैं. ये सभी दिहाड़ी मजदूर और व्यापारी इसलिए परेशान हैं क्योंकि काले धन से धंधा करते हैं. कुमार भाजपा की स्थानीय इकाई से जुड़े हुए हैं. 

पुरानी करंसी का सहारा

स्थानीय किसानों का कहना है कि पेराई की कई इकाइयां या तो उधार काम कर रही हैं या फिर बंद हैं. उनमें से कुछ किसानों को पुरानी करेंसी में भुगतान कर रही हैं. बड़ौत में ऐसे ही एक किसान से इस रिपोर्टर की मुलाक़ात हुई. ये इकाइयां किसानों को एक क्विंटल गन्ने का सिर्फ 180 रुपए देती हैं, जबकि चीनी मिलें 305 रुपए प्रति क्विंटल. 

बड़ौत और बागपत के 80 से ज़्यादा गांवों में जिन किसानों को नकद की तुरंत जरूरत है, उनके लिए पेराई करने वाली इकाइयां ही एक मात्र विकल्प हैं क्योंकि 250 करोड़ रुपए से ज्यादा राशि का भुगतान नहीं करने के कारण उमेश मोदी ग्रुप की एसबीईसी शुगर मिल पर ताला पड़ा है. 

किसान कुंवर पाल सिंह ने बताया कि, 'नोटबंदी का हमारी ज़िंदगी पर कोई उलटा असर नहीं हुआ है क्योंकि हमारे पास तो पिछले साल से ही पैसे नहीं हैं.' गन्ना पेराई की इकाइयों ने 2015 से ही भुगतान नहीं किया है. सभी 84 ग्राम पंचायतों ने मिलों को 8 दिन के भीतर भुगतान करने का सामूहिक रूप से अल्टीमेटम दिया है वर्ना वे राज्य और राष्ट्रीय राजधानी में सडक़ों पर विरोध में उतर आएंगे. 

किसान और स्थानीय खापों के प्रमुख सुशील चौधरी कहते हैं, 'हम बोट कल्ब आएंगे और राजधानी जाने वाली सभी सडक़ें जाम कर देंगे.' रणजीत सिंह ने कहा कि अब तो आत्महत्या की नौबत आ गई है. उन्होंने याद दिलाया कि किस तरह पीएम मोदी ने 2014 में लोक सभा चुनाव की रैली में वादा किया था कि उन्हें बकाया राशि मिल जाएगी.

थक गए अब

किसानों की तरह ही दिहाड़ी मजदूरों को भी उनके मालिक पुरानी करंसी में भुगतान कर रहे हैं. ईंट के भट्टे पर काम करने वाले कमल कुमार कहते हैं, 'इन नोटों को लेने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं हैं.' कमल को रोजना 4000 ईंटें ट्रकों और ट्रैक्टरों पर लादने के एवज में 320 रुपए मिलते हैं. 

कुमार खुशकिस्मत हैं कि जिस भट्टे पर वे काम करते हैं, उसे 9 दिन बाद 40 हजार ईंटें देने का ऑर्डर मिला है मगर उधार. जिले में 500 से भी ज्यादा अन्य ईंट भट्टे स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं. राजस्व और रोजगार में उनका अधिकांश योगदान है, पर पिछले दस दिनों में कोई बिक्री नहीं हुई. 

जिला एसोसिएशन के प्रमुख राणा ने कहा सभी भट्टे बंद हैं और नोटबंदी ने हमारी कमर तोड़ दी है. ईंट भट्टा मालिक नीरज कुमार ने कहा कि दरअसल कैश नहीं होने से हमारी ईंटें बिन बिकी पड़ी हैं. हमारा धंधा ज्यादातर नकद होता है. सौ-सौ के 15 नोट बताते हुए एक अन्य ईंट भट्टा मालिक रणवीर सिंह पूछते हैं, 'तकलीफ में हम हमारे वर्करों की कैसे मदद करें.' हर ईंट भट्टे में लगभग 1000 वर्कर हैं और उनमें से कई अपने मालिकों के पास परेशानी की स्थिति में आते हैं. 

उन्होंने बताया, 'एक वर्कर ने अपनी पत्नी की डिलिवरी के लिए 5 हजार रुपए मांगे. उसे मना करना पड़ा.' पूर्व सरपंच फौजी का कहना है कि 'सरकार को युद्ध स्तर पर काम करने की आवश्यकता है.'  नोट छापने में कितना वक्त लग जाएगा, उसका अनुमान उन्होंने अखबार से लगाने की कोशिश की है. वे कहते हैं, '50 दिन कहना गलत है. जिस रफ्तार से काम हो रहा है, उसमें और वक्त लगेगा.' 

First published: 22 November 2016, 7:51 IST
 
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