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ईवीएम विवाद: चुनावी सर्वे और वोटिंग में इतना फर्क़ क्या मुमकिन है?

सादिक़ नक़वी | Updated on: 25 March 2017, 9:17 IST

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा की शानदार जीत को लेकर बसपा और सपा के जेहन में कई सवाल हैं. एक सवाल इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर है. उन्हें शक है कि कहीं इसके साथ छेड़छाड़ तो नहीं की गई. बसपा की सुप्रीमो मायावती ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से छेड़छाड़ का खुले आम आरोप लगाया है और कहा कि पार्टी इसके लिए सुप्रीम कोर्ट जाएगी. पर सपा अभी इसके बारे में कुछ तय नहीं कर पाई है.


सपा के एक नेता कहते हैं, ‘हमें कई निर्वाचन क्षेत्रों से शिकायतें मिली हैं, पर केवल इस आधार पर पक्का नहीं कह सकते कि कुछ गैरकानूनी हुआ है.’ वे आगे कहते हैं कि पार्टी अपने नुकसान का जायजा ले रही है और विभिन्न क्षेत्रों के अपने नेताओं के साथ बात कर रही है. स्थानीय नेता निर्वाचन क्षेत्रों की असंगतियों के बारे में बता रहे हैं, पर सपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने और इंतजार करने का फैसला लिया है.


समय आने पर वे मांग कर सकते हैं कि या तो चुनाव आयोग मतपत्र का फिर से इस्तेमाल करे या कम से कम वोटर-वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल से लैस इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का उपयोग करे ताकि मतदाता जान सकें कि उनके वोट कहां गए.

 

वे आगे कहते हैं, ‘मैं नहीं सोचता कि हम कोर्ट जाएंगे, क्योंकि बसपा ने यह तय किया है. हमें अगर एब्नॉमर्ल वोटिंग के पर्याप्त प्रमाण मिले, तो हम अपने समर्थकों और हितैषियों को विश्वास दिला सकेंगे कि कुछ गलत हुआ है. हम इस मुद्दे को उठाकर ऐसी छवि नहीं बनाना चाहते कि हार गए इसलिए ऐसा कह रहे हैं. इससे भविष्य में पार्टी की छवि पर बुरा असर पड़ेगा.’


परिणाम वाले दिन प्रेस सम्मेलन में अखिलेश ने कहा कि मायावती ने ईवीएम का मुद्दा उठाया है, पर वे किसी भी तरह का आरोप लगाने से पहले बूथ स्तर पर जांच का इंतजार करेंगे.

 

 

दावे

 

इस संबंध में निर्वाचन क्षेत्रों के आंकड़ों की तुलना कर रहे सपा के एक रणनीतिकार कहते हैं, ‘कम से कम 145 निर्वाचन क्षेत्रों में वोटिंग में असंगति पाई गई.’ उन्होंने एक निर्वाचन क्षेत्र का उदाहरण देते हुए अपने दावे को पुष्ट किया. मुरादाबाद में सपा विधायक कुंडरकी फिर से खड़े हुए थे. ‘यदि आप पिछले कुछ चुनावों की वोटिंग को देखें, जिसमें 2014 में मोदी लहर भी शामिल है, तो भाजपा को कभी 65 हजार से ज्यादा वोट नहीं मिले हैं. पर इस बार उसे लगभग 99 हजार वोट मिले हैं. जब मुस्लिम भाजपा को वोट नहीं कर रहे थे, तो यह कैसे संभव है. चुनाव तक हुए सर्वे में ऐसा असंभव ही लग रहा था.’


सपा के लिए काम कर रहे बोफिनों ने महासी निर्वाचन क्षेत्र का उदाहरण देते हुए ‘एब्नॉर्मल वोटिंग बिहेवियर’ के अपने दावे को और पुष्ट किया. इस बार भाजपा 58 हजार वोटों के शानदार मार्जिन से जीती है. उसके उम्मीदवार को 2012 के चुनावों में महज 38 हजार से कुछ ज्यादा वोट मिले थे और वे बसपा के उम्मीदवार कृष्ण कुमार ओझा से 2000 से कम वोटों से हार गए थे.


सपा के नेता ने कहा कि उन्हें कई शिकायतें मिल रही हैं. उम्मीदवारों का दावा है कि हिसाब गलत लगाया गया है. ‘कानपुर के एक निर्वाचन क्षेत्र में 2000 मत हैं, जिनमें से 1600 मुस्लिम वोटर्स हैं. फिर भी 1200 वोट भाजपा को चले गए.’ यह कैसे संभव है? सपा उम्मीदवार सकते में हैं.


वे आगे कहते हैं, ‘87 निर्वाचन क्षेत्र, जहां जीतने के लिए मुस्लिम और यादवों के पर्याप्त वोट हैं, और अन्य 34 निर्वाचन क्षेत्र, जहां मुस्लिम और जाटों के वोट उम्मीदवार को बहुमत से आगे ले जा सकते हैं, वहां भी सपा ने 87 निर्वाचन क्षेत्रों में महज 24 सीटें जीतीं और बसपा को उन 34 में से महज 3 सीटें मिलीं. इसकी जांच की जानी चाहिए क्योंकि हम पिछले 3-4 चुनावों से वोटिंग बिहेवियर का अध्ययन कर रहे हैं.’


बांदा में वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ काम कर रहे बसपा के स्थानीय कार्यकर्ता भी हैरान हैं. कहते हैं, ‘बांदा कस्बे में 7 से 8 मुस्लिम बहुल मोहल्ले हैं, वहां बसपा को पर्याप्त वोट मिले हैं.’ भाजपा को मुस्लिम वोट मिल सकते हैं. भगवा पार्टी ने भी यही दावा किया कि तीन तलाक के मुद्दे पर उन्हें अच्छी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने वोट दिए हैं. पर बसपा के कार्यकर्ता इस बात को नहीं मानते. वे कहते हैं, ‘इस क्षेत्र की महिलाएं उन्हें ही वोट देती हैं, जिन्हें घर के बुजुर्ग देते हैं.’

 

दूर हो शंका

 

सपा के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान पूछते हैं- ‘जब लोगों को संदेह है, तो चुनाव आयोग और सरकार उसे दूर क्यों नहीं करती?’ उन्होंने भाजपा को वो दिन याद करने को कहा, जब एलके अडवाणी सहित भाजपा के खुद के नेता कहते थे कि ईवीएम फूलप्रूफ नहीं है. और वे भाजपा राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ही थे, जो इस मुद्दे पर कोर्ट गए थे. केंद्र सरकार ने वीवीपीएटी मशीनों के लिए पैसा स्वीकृत नहीं किया है, इसलिए भी विपक्ष को सरकार पर हमला करने के लिए पर्याप्त बहाना मिल गया है. वे दावा कर रहे हैं कि यह पारदर्शिता के खिलाफ है.


खान पूछते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तीन साल बाद भी सरकार वीवीपीएटी मशीनों के लिए फंड्स जारी क्यों नहीं कर रही? 15 लाख वीवीपीएटी मशीनों की जरूरत है, जबकि भारतीय चुनाव आयोग के पास महज 30 हजार हैं, और अन्य 30 हजार की अगले कुछ महीनों में आने की उम्मीद है. भारतीय चुनाव आयोग ने ईवीएम के फूलप्रूफ होने के बारे में विस्तृत प्रेस रिलीज निकाला है और अब तक कोई भी उसके साथ छेड़छाड़ को सिद्ध करने के लिए आगे नहीं आया है. इससे इस मामले में कोई मदद नहीं मिली है.

इस मुद्दे पर और बवाल मच सकता है क्योंकि मायावती ने कोर्ट जाने का फैसला लिया है. बूथ की जांच के बाद हो सकता है, सपा भी मुद्दे पर खुल कर सामने आए.

First published: 25 March 2017, 9:17 IST
 
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