Home » उत्तर प्रदेश » Language row in UP Assembly: Sanskrit allowed, Urdu not
 

यूपी विधानसभाः संस्कृत को हां और उर्दू को ना

अतुल चंद्रा | Updated on: 2 April 2017, 9:46 IST


जब से राज्य विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत से जीत कर आई भाजपा ने सत्ता संभाली है, लगता है उत्तर प्रदेश विवादों का प्रदेश बन गया है. ‘एंटी रोमियो’ और अवैध बूचड़खानों को बंद करने के बाद अब गाज गिरी है भाषा पर. दो दिन पहले प्रोटेम स्पीकर फतेह बहादुर सिंह ने 403 सीटों वाले सदन में 319 वें सदस्य के तौर पर पद की शपथ ली. गौरतलब है कि 13 भाजपा विधायकों ने संस्कृत में शपथ ली थी, जबकि आजमगढ़ के दो विधायकों नफीस अहमद (गोपालपुर) और आलमबादी (निजामाबाद) ने उर्दू में शपथ ली थी.

बहादुर ने अहमद की शपथ को गलत ठहराते हुए उन्हें दोबारा हिन्दी में शपथ लेने को कहा. अहमद ने कहा, ‘‘मुझे हिन्दी में शपथ लेने पर कोई एतराज नहीं है लेकिन अगर विधानसभा में उर्दू भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता तो संस्कृत का भी नहीं किया जाना चाहिए. मेरी आपत्ति बस इतनी है कि संस्कृत में शपथ लेने वाले विधायकों को हिन्दी में शपथ लेने को क्यों नहीं कहा गया?


मामले को आगे बढ़ाने से पहले उन्होंने सरकार के आदेश की एक प्रति मांगी है. यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने इस बारे में वरिष्ठ नेता आजम खान से बात की है, अहमद ने जवाब दिया कि अभी तक उन्होंने ‘आजम भाई’ से इस बारे में कोई बात नहीं की है. दूसरी ओर, आलमबादी ने हिन्दी और उर्दू दोनों भाषा में शपथ ली थी. मगर उन्हें कोई शिकायत नहीं है क्योंकि उनकी उर्दू में ली गई शपथ भी विधानसभा रिकॉर्ड में दर्ज है.

 

ये हैं नियम


उत्तर प्रदेश विधानसभा के नियमानुसार इसके सदस्य हिन्दी और संस्कृत में शपथ ले सकते हैं लेकिन उर्दू में नहीं. विधानसभा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया ‘‘सदन के नियमानुसार, उर्दू में शपथ लेने की इजाजत नहीं है. केवल देवनागरी में ही शपथ ली जा सकती है. संस्कृत में शपथ लेना इसलिए मान्य कर दिया गया क्योंकि यह भी देवनागरी में लिखी हुई है.


उन्होंने कहा, विधानसभा के नियम 1958 में बनाए गए थे. ये संवैधानिक प्रावधानों से अलग थे. संविधान में हर सदन के प्रत्येक सदस्य को अपनी पसंद की भाषा में शपथ लेने का अधिकार है. उन्होंने बताया आजम खान भी इसीलिए दो बार शपथ लेते हैं. पहले उर्दू में और फिर हिन्दी में. सामान्यतः वे अपने चैम्बर में ऐसा करते हैं. सालों से यही परिपाटी चली आ रही है लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी विधायक ने उर्दू और संस्कृत में भेदभाव की बात उठाई है.

 

संस्कृत में शपथ


यहां मजेदार बात यह है कि संस्कृत का चलन प्रोटेम स्पीकर बहादुर ने ही शुरू किया था. गोरखपुर के कैम्पियरगंज के विधायक और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के बेटे फतेह बहादुर ने 27 मार्च को राज्यपाल द्वारा शपथ दिलवाए जाने पर संस्कृत में शपथ ली थी. इसके बाद भाजपा के पहली बार चुन कर आए 13 विधायकों ने संस्कृत में शपथ ली. संस्कृत में पहली शपथ लेने वाली अनुपमा जायसवाल ने कहा कि यह संस्कृत को बढ़ावा देने का छोटा सा प्रयास है.’’


उनके अलावा जिन अन्य विधायकों ने संस्कृत में शपथ ली, वे हैं धीरेन्द्र सिंह (जेवर), संजय (अनूपशहर), शशांक त्रिवेदी(महोली), सुरेश कुमार श्रीवास्तव (लखनऊ-पश्चिम), नीरज बोहरा(लखनऊ-उत्तर), चंद्रिका कुमार उपाध्याय(चित्रकूट), सतीश चंद्र दिवेदी (सिद्धार्थनगर), चंद्रप्रकाश शुक्ला(बस्ती), पवन कुमार(कुशीनगर), धनंजय कंजौलिया, सुरेंद्र सिंह (बलिया) और वाराणसी के सुरेंद्र नारायण सिंह.

 

21 साल पहले


जहां तक अलमबादी की बात है, उनके सामने भाषा का यह मुद्दा पहली बार नहीं उठा है. उन्होंने बताया ‘‘1996 में जब केसरी नाथ त्रिपाठी विधानसभा के स्पीकर थे, उस समय मैंने पूरे साल भर तक शपथ नहीं ली थी. उसके बाद मुझे इस बात का तकनीकी पक्ष समझाया गया और मैं साल भर बाद स्वतः ही विधानसभा सदस्य मान लिया गया.’’ उन्होंने कहा, संविधान में शपथ की भाषा को लेकर कोई नियम नहीं बताया गया है कि किस भाषा में शपथ लेनी चाहिए.


उन्होंने कहा, ‘‘मंगलवार को अध्यक्ष पद से मुझे हिन्दी में शपथ लेने को कहा गया. मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. मैंने दोबारा हिन्दी में शपथ ली और मुझे इस बात की खुशी है कि मेरी उर्दू भाषा वाली शपथ सदन के रिकॉर्ड में रखी गई.’’

 

वंदेमातरम् पर भी विवाद


भाषा विवाद अभी थमा भी नहीं कि मेरठ में एक और बात पर विवाद छिड़ गया. यहां नगर निगम में वंदे मातरम् गाए जाने के दौरान मुसलमान पार्षद वाक आउट कर गए. इस पर मेयर ने तुरन्त ही उनकी सदस्यता समाप्त कर दी. मुसलमान राष्ट्र गीत नहीं गाते, उनका तर्क है कि यह शरिया के खिलाफ है, क्योंकि इसमें मातृभूमि का गुणगान किया गया है.

मेरठ नगरपालिका में जैसे ही कुछ लोगों ने वंदेमातरम् गाना शुरू किया, सात मुसलमान पार्षद सदन से वाक आउट कर गए. इस पर भाजपा के मेयर हरिकांत अहलुवालिया ने सदन में एक प्रस्ताव पेश किया कि इन सात विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी जाए. उन्होंने यह भी कहा कि जिन पार्षदों ने राष्ट्र गीत गाने से इनकार कर दिया है, उन्हें सदन में न घुसने दिया जाए.


अहलुवालिया ने निगम की कार्यवाही शुरू करने से पहले वंदेमातरम गाना अनिवार्य कर दिया है. वाक आउट करने वाले शरीफ खान ने कहा, जब तक सुप्रीम कोर्ट निर्देश नहीं देता तब तक वे अपने रुख पर कायम हैं. ‘‘हम बहिष्कार जारी रखेंगे.’’ सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार किसी को भी उसकी इच्छा के विरुद्ध वंदे मातरम् गाने के लिए जबरन मजबूर नहीं किया जा सकता.


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा के अनुसार, हर देश भक्त भारतीय को वंदे मातरम गाना ही चाहिए. 1998 में राज्य में कल्याण सिंह सरकार ने सरकारी प्राथमिक स्कूलों में वंदेमातरम् और सरस्वती वंदना का गायन अनिवार्य कर दिया था. परन्तु उनका यह फैसला गलत साबित हो गया था.

First published: 2 April 2017, 9:46 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी