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मुसलमां कैसे-कैसे: देशभक्त मुसलमान, कट्टरपंथी मुसलमान, सच्चा मुसलमान

आदित्य मेनन | Updated on: 11 March 2017, 7:41 IST

उत्तरप्रदेश में सभी चरणों के चुनाव हो चुके हैं. पिछले कुछ महीनों से हर वह शख्स, जो खुद को एक्सपर्ट समझता है, उसने ‘मुस्लिम वोट’ के बारे में कुछ न कुछ कहा है. मसलन ‘मुस्लिम वोट से चुनाव का फैसला होगा’, ‘मुसलमानों का रुझान मायावती की ओर हो रहा है’, ‘मुसलमान अखिलेश से प्यार करते हैं’, ‘मुसलमान काफी संख्या में वोट दे रहे हैं’. ‘मुस्लिम वोट’ को इतना शक्तिशाली बना दिया गया है, जिसका अपना अस्तित्व है.


पर वोटिंग के अंतिम दिन हमें क्रूर सच्चाई से रूबरू होना पड़ा कि मुसलमान मतदाता वास्तव में कितना कमजोर है. एक ऐसे ही वोटर सरताज 22 साल के सैफुल्लाह के पिता हैं. सैफुल्लाह को आतंकी बताकर लखनऊ में बुधवार को उत्तरप्रदेश आतंक-विरोधी दस्ते ने गोली से उड़ा दिया. सरताज ने अपने बेटे के शव को दफनाने से इनकार कर दिया, कहते हुए कि, ‘हम देशद्रोही के शव को नहीं लेंगे. उसने हमें ही नहीं, पूरे देश को बदनाम किया है.’ अपनी देशभक्ति का दावा करते हुए सरताज ने कहा, ‘हम भारतीय हैं, हम यहां जन्मे हैं, हमारे पुरखे यहां जन्मे हैं और जो देशद्रोही है, वह बेटा या उससे कोई रिश्ता नहीं हो सकता. ’


सबने त्याग और देशभक्ति के लिए पिता के साहस की तारीफ की. और करनी भी चाहिए. अपने बेटे को त्यागने के लिए साहस चाहिए, और देश के लिए आदर्श प्यार. ध्यान दें, कई तथाकथित देशभक्तों को तो उस शख्स का त्याग करने में भी मुश्किल होती है, जिसने राष्ट्रपिता की हत्या की थी. पर फिलहाल उस मुद्दे को छोड़ते हैं.

 

...तो क्या करते


यहां अहम सवाल यह है कि क्या सरताज के पास अपने बेटे सैफुल्लाह को तजने के सिवाय कोई विकल्प था? सोचें क्या होता अगर वह अपने बेटे की लाश लेता और दफ़न-कफ़न करता. उन्हें और उनके परिवार को हमेशा परेशान किया जाता. हर कोई कानून प्रवर्तन एजेंसियों से लेकर स्थानीय गुंडे, हिंदुत्व सतर्कता समिति के सदस्य, लड़ाका पड़ोसी और रिश्तेदार तक, उन्हें परेशान करता. उन्हें काम पाने या शादियां करने में मुश्किलें आतीं.


कल्पना करें, किस उत्साह और उत्तेजना से हिंदुत्व ब्रिगेड सोशल मीडिया पर सैफुल्लाह के दफनाने की तस्वीर शेयर करती, इस कैप्शन के साथ कि ‘जो लोग आतंकियों के दफनाने में शरीक होंगे, उनके साथ भी यही होगा.’ इससे उन्हें पूरे मुसलमान समुदाय की आतंकी समर्थक छवि बनाने का एकदम सही बहाना मिल जाता.


तो फिर से पूछता हूं कि सरताज के पास क्या कोई विकल्प था? क्या उनके पास कानूनी भाषा बोलने का भी विकल्प था कि उनके बेटे पर आतंकी होने का संदेह था, वह आंतकी नहीं था, जब तक कि जांच से उसका अपराध पुष्ट नहीं हो जाए. क्या इससे फर्क पड़ता है कि मुसलमान मतदाता ने मायावती यादव को वोट दिया या अखिलेश को? अगर वे अधिकार से अपने बेटे को दफनाना चुनते, तो क्या उनमें से कोई भी उन्हें भेदभाव या उत्पीड़न से बचाने का आश्वासन देता?


क्या इससे फर्क पड़ता है कि सरताज पसमांदा, अशराफ, अंसारी या पठान हैं-ये वे शब्द हैं, जिनका बराबर उपयोग होता है जब विशेषज्ञ ‘मुस्लिम वोट’ को लेकर अपने ज्ञान का बखान करते हैं. अंत में सरताज की पहचान एक आतंकी के पिता के तौर पर होगी? या ‘एक अच्छा मुसलमान’, जिसने ‘खराब मुसलमान’ बेटे को छोड़ दिया? महज एक घटना बयान करती है कि जिस सशक्त ‘मुस्लिम वोट’ की बात हो रही है, वह सरताज जैसे लाखों बेबस लोगों से बना है, जिनके सामने मुख्य चुनौती अपने अस्तित्व को बनाए रखने की है.

 

बैकग्राउंड

अस्तित्व की बात करते समय हम उस पृष्ठभूमि को देखें, जहां से सरताज और सैफुल्लाह हैं. वे कानपुर के दक्षिण पूर्वी उपनगर जाजमऊ में रहते हैं. इस इलाके में 80 फीसदी मुसलमान हैं, जो कानपुर के चमड़े उद्योग का केंद्र है. पर पर्यावरणीय नियमों को सख्ती से लागू करने, गौ-रक्षकों द्वारा सतर्कता और हाल में नोटबंदी के कारण यह उद्योग तबाह हो गया है. चमड़े के कई कारखाने बंद हो गए हैं, लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं, और इस तरह उनके जीवन पर बन आई है.


हजरत मखदूम शाह आला की दरगाह यहां का मुख्य ऐतिहासिक स्मारक है. यहां के लोगों को इस बात का गर्व है कि दशकों से यहां कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ. जाहिर है, चमड़े के उद्योग बंद होने और गौ-रक्षकों की सतर्कता ने यहां का सामाजिक संतुलन बिगाड़ दिया है.


पर यह पृष्ठभूमि मायने नहीं रखती. क्या वाकई रखती है? अंतत: वह सरताज हो या सैफुल्लाह या उत्तरप्रदेश में कोई अन्य मुसलमान उन्हें हमेशा राजनीतिक स्पर्धा के बयानों के प्रिज्म से देखा जाएगा.

मिसाल के लिए बुधवार को पूरे दिन जब दक्षिण पूर्वी उत्तरप्रदेश में वोट पड़ रहे थे, सैफुल्लाह को आईएसआईएस का आदमी बताया जा रहा था, बल्कि चुनाव के अंतिम चरण में वोट के ध्रुवीकरण के जबर्दस्त प्रयास किए जा रहे थे. पर शाम तक जब वोटिंग का समय खत्म हो गया, एडीजी कानून और व्यवस्था ने बड़ी शांति से कहा कि आईएसआईएस से संबंध होने के कोई सबूत नहीं थे. पुलिस के पहले वाले बयान का खंडन करते हुए.

आख़िर में हम इंसानी संघर्ष, चुनौतियां और अलग-अलग मुसलमानों की महत्वाकांक्षाओं के लिए कुछ करने की कोशिश नहीं करते. उन्हें ‘देशभक्त मुसलमान’, ‘कट्टरपंथी मुसलमान’, ‘शांत मुसलमान’ या ‘मुस्लिम वोट’ के हिस्से के रूप में देखना बड़ा आसान है.

 

First published: 11 March 2017, 7:41 IST
 
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