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मेरठ के मीट कारोबारी: क्या यही अच्छे दिन हैं जिसका मोदी ने भरोसा दिया था?

सादिक़ नक़वी | Updated on: 30 March 2017, 8:25 IST


मेरठ के पुराने इलाके घंटाघर से कुछ ही मीटर की दूर पर स्थित कोटला मोहल्ले की संकरी गलियां सुनसान पड़ी हैं. एक कोने पर ठेला खड़ा है जिस पर हलीम बिरयानी बेची जाती है, पर पूरे दिन ज्यादा ग्राहक आते हुए नहीं दिखाई दिए. ठेले के मालिक मोहम्मद सलीम कहते हैं कि हम क्या कर भी सकते हैं जब बाजार में मीट ही नहीं मिल रहा है. उन्होंने दावा किया जब से योगी आदित्यनाथ ने उप्र के मुख्यमंत्री पद का कार्यभार संभाला है और 'अवैध' मीट की दुकानों और बूचडख़ानों को बंद करना शुरू किया गया है, तब से उन्होंने भैंस के मांस की जगह सोया का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.


यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में 'अवैध' बूचडख़ानों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही गई थी. पर अब लगता है कि यह राज्य सरकार की प्राथमिकता बन गई है. कोटला में मीट की छोटी-छोटी कई दुकानें हैं जिन पर भैंस का मांस और मटन बिकता है. ये छोटे दुकानदार मोहल्ले के आसपास रहने वाली बड़ी मुस्लिम आबादी की जरूरत पूरी करते हैं. मोहम्मद नईम सवाल करते हैं कि क्या यही भाजपा के अच्छे दिन हैं जिसका वादा पार्टी ने किया था. क्या मुसलमान इसी
व्यवहार के लायक हैं कि उन्हें उनके जीवनयापन के कार्यों से ही दूर कर दिया जाए.


खलील अहमद, जिनकी दुकान का शटर बंद है, अपनी दुकान की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि प्रशासन कहता है कि हम गोवध कर रहे हैं जबकि हम केवल भैंस के मांस की बिक्री करते हैं. हमारे पास लाइसेंस है. हम इसका रिन्यूवल कराना चाहते हैं पर प्रशासन ने इसका नवीनीकरण करने से इनकार कर दिया है. मीट बेचने वाले अन्य दुकानदार सड़कों पर हुक्का पीते दिख रहे हैं. मोहम्मद शाहिद कहते हैं कि हम सब लोगों के पास लाइसेंस है. लेकिन न तो प्रशासन हमें काम करने की अनुमति दे रहा है और न ही लाइसेंस को रिन्यू कराने का वक्त दे रहा है.

वैध बनाम अवैध


स्थानीय नगर निगम के अधिकारियों का दावा है कि उन्होंने मेरठ में 184 'अवैध' दुकानों की पहचान की है. निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी कुंवर सेन ने कैच से कहा कि उनमें से कई लोगों के पास लाइसेंस नहीं हैं. जिनके पास हैं भी तो उनका रिन्यूवल कराया जाना है.


एक अन्य अधिकारी का कहना है कि हमने 60 दुकानों को सील कर दिया है. बाकी सभी को चेतावनी दी गई है कि वे जब तक अपनी दुकानें न खोलें और मांस की आपूर्ति न करें जब तक कि उनके कागजात कानूनी रूप से दुरुस्त नहीं हो जाएं. इन अधिकांश दुकानों में भैंसे का मांस बिकता है जबकि कुछ दुकानों पर मटन और चिकन मिलता है. बहुत ही कम दुकानों पर सुअर का मांस मिलता है.

 

नहीं मिल रहा मांस


इस कड़ी कार्रवाई का परिणाम यह हुआ है कि शहर में कई जगह मांस का अभाव हो गया है. कई दुकानदारों ने डर के कारण अपनी दुकानों के शटर गिरा लिए हैं जबकि अन्य दुकानदार जो अपनी दुकानें अभी खोले हुए हैं, उन्हे यह डर सताता रहता है कि प्रशासन की दुर्भावना के अगले शिकार वे हो सकते हैं.

सोती गंज मीट बाजार में मछली बेचने वाले इरफान अहमद कहते हैं कि 1962 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि मछली 'जल तरकारी' (वेजीटेबिल ऑफ सी) है. वह कहते हैं कि उम्मीद है कि उनका व्यापार प्रभावित नहीं होगा. साथ ही कम से कम मछली बेचने वाले तो इस कार्रवाई की चपेट में नहीं आएंगे. एक छोटा होटल रूमानी कार्नर चलाने वाले आबिद अहमद कहते हैं कि चिकन और मटन तो कई जगहों पर मिल जाएगा, पर हमें भैंस के मांस की भी जरूरत है.

 

कड़ी कार्रवाई


ऐसा नहीं है कि केवल छोटे मीट व्यवसायियों को ही निशाने पर लिया गया हो. मीट प्रोसेसिंग से बड़े हाउसों को शहर में सील किया गया है. इन प्रोसेसिंग हाउसों के मालिकों का दावा है कि यह कार्रवाई फिल्मी आधार पर की गई है. इन लोगों का कहना है कि अधिकारियों ने मीट के तीन प्रोसेसिंग संयंत्र अल कैफ, अल अक्स और अल यासीर को सील कर दिया है. उनका कहना है कि हमारे पास विकास प्राधिकरण द्वारा स्वीकृत मानचित्र तक नहीं है.


पूर्व सांसद और पूर्व मेयर शाहिद अखलाक का कहना है कि यह सब जल्दबाजी में इसलिए किया गया कि प्रशासन नई सरकार द्वारा कामकाज संभालने के बाद से ज्यादा उत्साहित था. सरकार ने यह साफ ही कर दिया था कि वह अवैध बूचड़खानों को बंद करना चाहती है. हमारा इस मुद्दे पर कोई विवाद था ही नहीं. मीट निर्यात व्यापार क्षेत्र में अखलाक एक बड़े व्यापारी हैं.


उनका कहना है कि अधिकारियों की इस कार्रवाई का असर सिर्फ उन हजारों लोगों पर ही नहीं पड़ेगा जो इन संयंत्रों में काम कर रहे हैं, बल्कि उन पर भी पड़ेगा जो इससे जुड़ा व्यापार कर रहे हैं. चमड़ा बनाने के कारखाने में लगे कामगारों पर इसका असर हुआ है और चिकन उद्योग आदि भी इस कार्रवाई से प्रभावित हुआ है. दि ऑल इंडिया मीट एंड लाइवस्टॉक एक्सपोर्ट एसोसिएशन का दावा है कि देश लगभग 27,000 करोड़ रुपए के मांस का निर्यात करता है. और इसका बड़ा हिस्सा 15,000 करोड़ उप्र का है. निजी क्षेत्र में पूरे देश में सरकार द्वारा अनुमोदित 72 बूचडख़ाने हैं. इनमें से 38 उप्र में हैं.

 

नाम में क्या रखा है?


जो लोग इस उद्योग में काम कर रहे हैं, वे भी बूचडख़ाने या स्लॉटरहाउस शब्द का इस्तेमाल किए जाने से खफा हैं. अल-फहीम निर्यात फर्म से जुड़े क्वालिटी कन्ट्रोल का काम देखने वाले एक अधिकारी का कहना है कि यह बूचडख़ाना कैसे हो गया? यहां यूरोप से लाए गए आधुनिक उपकरण हैं. गुणवत्ता की निगरानी के लिए इंजीनियर्स से लेकर माइक्रोबायोलॉजिस्ट भी नियुक्त किए गए हैं. वे इसे फूड प्रोसेसिंग यूनिट क्यों नहीं कहते? इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है.


पूर्व सांसद याकूब कुरैशी, जो पैगम्बर मोहम्मद साहब का कार्टून बनाने वाले डेनिश कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने वाले को पुरस्कार देने की घोषणा के कारण बदनाम हुए थे, अल-फहीम संयंत्र के मालिक हैं. संयंत्र के एक अधिकारी प्रदोश कुमार का कहना है कि संयंत्र के भीतर अनेक स्त्री और पुरुषों को काम करते हुए देखा जा सकता है. ये लोग मीट प्रॉसेसिंग के विभिन्न चरणों से जुड़े हुए हैं. इन्होंने समुचित तरीके से अप्रेन पहने हुए हैं, दस्ताने लगाए हुए हैं, मास्क लगाए हुए हैं. कामगारों में 20 फीसदी महिलाएं हैं.


कुमार कहते हैं कि जबसे नई सरकार आई है, संयंत्र हर रोज 1,000 भैंसों की क्षमता के नीचे काम कर रहा है. हम इन दिनों में केवल 200-300 भैंसों का ही प्रबंध कर सके हैं क्योंकि जो लोग हमारे लिए माल लाते हैं, वे डरे हुए हैं. उनमें से कुछ लोगों को तो संयंत्र तक भैंस लाने के दौरान ही निशाने पर ले लिया गया है.

 

एक पहलू यह भी


इस बीच स्लॉटरहाउसों की वैधता और बिना व्यवसाय वाले निजी स्लॉटरहाउसों की अवैधता को लेकर भी संदेह है. मेरठ का मामला भी ऐसा ही है. शहर के बीचो-बीच नगर निगम द्वारा चलाए जा रहे पुराने स्लॉटरहाउस लम्बे समय से विवाद की जड़ बने हुए थे. पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी की सरकार द्वारा इसे बंद कर दिया गया था और मकानों को ढहा दिया गया था. इसे शहर से दूर हापुड़ रोड पर स्थानान्तरित कर दिया गया था.

स्थानीय मीट व्यापारियों का कहना है कि पिछले कुम्भ के दौरान तत्कालीन राज्य सरकार के मंत्री आजम खान ने इसे बंद किए जाने का आदेश जारी कर दिया था ताकि गंदगी गंगा नदी में न जाए. तब से शहर में कोई भी स्लॉटरहाउस नहीं है.
शहजाद कुरैशी कहते हैं कि एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट नगर निगम के पास लम्बित पड़ा हुआ है. इस पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आपत्ति लगा दी है.


कुरैशी सवाल करते हैं कि दिल्ली में जब कसाबपुरा में पुराने स्लॉटरहाउस को बंद किया गया था, तब वे गाजीपुर चले गए थे. ऐसा ही वे यहां क्यों नहीं कर सकते? इस तरह से क्या वे अवैध वध को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं? वह कहते हैं कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने भी इस व्यापार से जुड़े लोगों के लिए कुछ नहीं किया. यह सिर्फ भाजपा ही नहीं है. सपा ने भी क्या किया है?

सेन इस बात से सहमत हैं कि मेरठ में कोई भी वैध स्लॉटरहाउस नहीं है. शटडाउन के बाद स्थानीय मीट व्यापारियों ने अखलाक के साथ एक समझौता किया है कि उन्हें उनके मैकेनाइज्ड कसाईखाने अल-शकीब में पशु काटने की अनुमति दी जाए. सुबह 6 से 9 बजे तक उन्हें इसकी अनुमति भी दी गई लेकिन पिछले एक सप्ताह से वह भी बंद है.

 

सिर्फ मेरठ ही नहीं


मुस्लिम मीट व्यापारियों के एक संगठन जमीयत उल कुरैश के एक पदाधिकारी यूसुफ कुरैशी का कहना है कि पूरे राज्य में छोटे और बड़े सब मिलाकर लगभग 2,100 स्लॉटरहाउस हैं. सभी म्युनिस्पिल संस्थाओं के हैं. वह कहते हैं कि अब अजीब तरह से सभी को अवैध कहा जा रहा है और उन्हें बंद कर दिया गया है. वह सवाल करते हैं कि क्या यह सरकार और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे सुनिश्चित करें कि सभी कागजात नियमानुसार हों?


यूसुफ कुरैशी यह भी कहते हैं कि पूर्ववर्ती सपा सरकार ने प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप मॉडल के आधार पर स्लॉटरहाउसों के आधुनिकीकरण का विचार आगे बढ़ाया था. अब तक केवल एक ही परियोजना बरेली में पूरी हो सकी है. हालांकि, अभी भी इसमें कामकाज शुरू नहीं हुआ है.

वहीं मेरठ में स्थानीय निर्यातकों ने प्रशासन को ज्ञापन दिया है कि उन्हें निशाने पर न लिया जाए. ज्ञापन में कहा गया है कि यदि मुसलमानों को इस तरीके से व्यापार करने से वंचित किया गया तो उनमें डर पैदा हो जाएगा. क्या सबका साथ सबका विकास सरकार का यही वादा है. एक सूत्र के अनुसार इस व्यवसाय में जो लोग जुड़े हुए हैं, उनमें पिछड़ी जाति के 25 फीसदी मुस्लिम पुरुष हैं, 25 फीसदी अन्य पिछड़ी जातियों के तथा 50 फीसदी सामाजिक रूप से पिछड़े समुदाय की महिलाएं हैं. इस तरह से देखा जाए तो इस कार्रवाई का असर केवल मुसलमानों पर ही नहीं पड़ेगा, काफी संख्या में गैर-मुस्लिम भी इससे प्रभावित होंगे.

 

 

सरकार का दखल


इस बीच, जमीयत उल कुरैश का एक प्रतिनिधिमंडल जब लखनऊ में केबिनेट मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह से मिला तो मंत्री जी ने कहा कि अति उत्साहित अधिकारियों को लाइसेंसशुदा इकाईयों को निशाना नहीं बनाना चाहिए. प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मिलने का समय मांगा था. मुख्यमंत्री ने तब सिंह को नियुक्त किया कि वे मीट व्य़ापारियों की समस्याओं को सुनें. उधर, योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में अपने भाषण में कहा है कि सरकार उन कसाईखानों पर कोई कार्रवाई नहीं करेगी जो नियमों के अनुसार चल रहे होंगे और जिनके पास लाइसेंस होगा.

यूसुफ कुरैशी कहते हैं कि हम मंत्री जी से मिले और उनसे कहा है कि जब तक नए कसाईखाने बनकर तैयार नहीं हो जाते, सरकार पुराने बूचड़खानों का इस्तेमाल करने की अनुमति दे. वह कहते हैं कि प्रतिनिधिमंडल को बताया गया कि मुख्यमंत्री स्वच्छ भारत अभियान को लेकर विशेष चिन्तित हैं और यह भी बताया गया कि बूचड़खानों पर कार्रवाई इसी से सरोकार रखती है.

यूसुफ कुरैशी कहते हैं कि लेकिन मंत्री जी ने वचन दिया है कि सरकार एक कार्य़योजना के साथ आगे आएगी. यदि वे हमारी नहीं सुनते हैं तो हमारे पास कोई विकल्प नहीं है लेकिन हम एकजुट होकर राष्ट्रव्यापी हड़ताल करेंगे. वह कहते हैं कि हम अदालत की भी शरण लेंगे.

 

First published: 30 March 2017, 8:24 IST
 
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