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...और समाजवादी पार्टी में मुलायम का अध्याय ख़त्म हो गया

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 17 January 2017, 7:33 IST

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कलाई में घड़ी नहीं बांधते मगर ऐसा लगता है कि जैसे वक़्त उनके साथ कदमताल कर रहा है. चुनाव आयोग के फैसले ने समाजवादी पार्टी में पांच महीने से चल रही उठा-पटक को ख़त्म करते हुए उन्हें समाजवादी पार्टी का मुखिया मान लिया है. इसी के साथ उन्हें चुनाव निशान साइकिल के इस्तेमाल की इजाज़त भी मिल गई है. 

अखिलेश यादव निर्विवाद रूप से अब पार्टी के शीर्ष लोकप्रिय नेता हैं. उन्हें देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की कमान 2012 में जनता ने सौंपी थी. वह राज्य के मुखिया थे और संगठन की बागडोर मुलायम सिंह ने अपने पास रखी थी. मगर चुनाव आयोग के फ़ैसले से अब वह संगठन के भी सर्वेसर्वा बन गए हैं. समाजवादी पार्टी अब जवान हो गई है. 

अखिलेश की अगुवाई में समाजवादी पार्टी अब उसी रंग में दिखेगी, जिसकी जद्दोजहद वह मुख्यमंत्री बनने के बाद से कर रहे थे. सपा की कमान के साथ-साथ पार्टी का कोष, कार्यालय अब अखिलेश के हवाले हो गया है. पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते अब समाजवादी पार्टी में सभी अहम पदों पर नियुक्तियां वही करेंगे. कुल मिलाकर पार्टी अब अखिलेश चलाएंगे.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में सपा उम्मीदवारों के नाम भी अब उनकी मर्ज़ी से तय होंगे. समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में विकास को एजेंडा बनाकर चुनाव लड़ेगी जिसका अखिलेश दावा करते रहे हैं. 

मुलायम युग ख़त्म

वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग के इस फ़ैसले से समाजवादी पार्टी में मुलायम युग का अंत भी हो गया. 25 साल पहले अपनी मेहनत, खून पसीने से बनाई पार्टी मुलायम सिंह के हाथ से पूरी तरह निकल गई. मुलायम सिंह के पास दूसरे नेताओं के साथ काम करते हुए पार्टी तोड़ने का पुराना अनुभव रहा है मगर उनके बेटे अखिलेश ने अब उन्हें उनकी ही भाषा में जवाब दे दिया है. 

अपने जुझारू तेवर और संघर्ष के दम पर मुलायम सिंह ने पार्टी को चार बार सत्ता दिलाई और एक मज़बूत जातीय गठबंधन (मुसलमान और यादव) भी दिया. उत्तर प्रदेश में कोई भी नेता मुलायम से पहले एमवाई गठबंधन को इतने धारदार ढंग से तैयार नहीं कर पाया था मगर ऐसा लगता है कि अखिलेश की अगुवाई में पार्टी इस पारंपरिक छवि से बाहर निकल आएगी. 

कहां थे कहां पहुंचे

भारतीय राजनीति में अगर मुलायम सिंह की छवि एक जुझारू नेता की है तो वह उन फ़ैसलों के लिए भी हमेशा याद किए जाएंगे जिसकी उम्मीद उनसे नहीं की गई थी. मगर 11 सितंबर 2016 से विवाद शुरू होने के बाद जब उन्होंने एक बार फिर दांव चलना शुरू किया तो उनके बेटे और पार्टी के बहुत सारे नेताओं ने उनकी एक ना सुनी.  

हालात यहां तक पहुंच गए कि मुलायम सिंह यादव ने जिन नेताओं को पाल-पोस कर बड़ा किया था, सभी अखिलेश के पक्ष में खड़े हो गए और जीत अखिलेश की हुई. 

यह देखना दिलचस्प होगा कि यादव परिवार अब किस करवट बैठेगा क्योंकि बीते पांच महीनों के टकराव की दीवार बहुत ऊंची हो चुकी है. जहां अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव उनके विरोधी हैं, वहीं मुलायम की दूसरी पत्नी और बेटे प्रतीक यादव की रहस्यमयी चुप्पी तूफ़ान से पहले के सन्नाटे की तरफ़ इशारा करती है. 

मुलायम सिंह को इस फ़ैसले का अंदाज़ा सोमवार की सुबह ही हो गया था. जब वह पार्टी कार्यालय पहुंचे तो कार्यकर्ताओं ने उनसे पार्टी को बचाने का आग्रह किया. जवाब में मुलायम सिंह बोले कि पार्टी सिंबल रहे ना रहे मगर आप सभी हमारे साथ रहें. 

उन्होंने अखिलेश पर हमला बोलते हुए यहां फिर एक राजनीतिक दांव चलने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि अखिलेश ने एक मुसलमान अफ़सर को पुलिस प्रमुख बनाने का विरोध किया था. इस बयान से मुलायम मुसलमानों तक यह संदेश पहुंचाना चाह रहे थे कि उनका हित मुलायम के ही साथ है. सुबह ही मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान भी कर दिया था. 

इसके बाद 19 विक्रमादित्य मार्ग पर पहली बार मुलायम सिंह यादव मुर्दाबाद के नारे लगे. अखिलेश और मुलायम के समर्थक आमने सामने आ गए और धक्का-मुक्की हुई. मामला बढ़ता देख अखिलेश ने सूबे के नए प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम को बाहर भेजकर बीच बचाव करवाया. 

इन सबके बावजूद, जब चुनाव आयोग का फ़ैसला आया तो अखिलेश अपने पिता मुलायम सिंह से आशीर्वाद लेने पहुंचे. दूसरी तरफ़ उनके समर्थक 5, कालीदास मार्ग पर इस जीत का जश्न मनाने के लिए जमा हो गए. वहां ख़ुशी मनाई गई और मिठाइयां भी बंटी. इसी दौरान अखिलेश ने अपने समर्थकों तक यह संदेश भी भिजवाया कि जश्न के नाम पर किसी तरह के आपत्तिजनक नारे नहीं लगने चाहिए. 

दूसरी तरफ शिवपाल यादव ने अपने खास विधायकों को फोन कर कहा कि आप लोग हमारे सिंबल पर चुनाव लड़िएगा. मगर  जैसे डूबते सूरज का कोई साथी नहीं होता है, वैसे ही शिवपाल को सुनने वाला नज़र नहीं आ रहा है.  

अमर सिंह जिन्हें समाजवादी परिवार में फूट का मुख्य संदिग्ध माना जा रहा था और जिन्हें बाहरी बताकर अखिलेश और रामगोपाल ने हमला बोला था, वह चुनाव आयोग का फैसला आने के एक दिन पहले लंदन चले गए थे. क्या वह किसी के इशारे पर लंदन गए? लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारे में इसकी ख़ूब चर्चा है. 

First published: 17 January 2017, 7:33 IST
 
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