Home » उत्तर प्रदेश » No rest for the dead: Demonetisation issues hit cremation grounds, mourners suffer more
 

परलोक में भी मारामारी: मणिकर्णिका घाट पर नोटबंदी का असर

अतुल चंद्रा | Updated on: 16 November 2016, 7:36 IST
QUICK PILL
  • नोटबंदी के बाद जहां पुरानी नोट जमा करने और नई नोट हासिल करने के लिए बैंक और एटीएम के बाहर संघर्ष चल रहा है, वहीं कुछ लोगों ने इस मौक़े को कमाई का जरिया बना लिया है. 
  • श्मशान घाटों पर लकड़ी बेचने वालों के लिए यह एक ऐसा मौक़ा है जो सरेआम खुली नकदी की मांग कर रहे हैं. तय रेट से ज्यादा कीमत वसूली जा रही है.

वाराणसी का मणिकर्णिका घाट महाश्मशान भी कहा जाता है. हिंदू मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार होने पर स्वर्ग प्राप्ति होती है. लेकिन नोटबंदी की चपेट में स्वर्ग का यह दरवाजा भी आ गया है. यहां जब लोग अपने परिजनों के शव लेकर आते हैं तो लकड़ी बेचने वाले खुली नोट न होने का रोना रोते हैं. चिता जलाने के लिए लकड़ी यहां 300 रुपए से लेकर 700 रुपए प्रति कुंतल तक मिलती है. दूर-दराज के इलाके से आए लोगों से लकड़ी बेचने वाले साफ कह रहे हैं कि उसके पास लौटाने के लिए खुले रुपए नहीं हैं. 

मान लीजिए कि शवदाह के लिए किसी ने 4,800 रुपए की लकड़ी खरीदी तो उसे 5,000 रुपए देने ही पड़ जाते हैं. मतलब प्रति शव पर सीधे-सीधे 200 रुपए ज्यादा की कमाई. वाराणसी के रहने वाले गुलशन कपूर श्मशान स्थल पर मुनाफ़ा कमाने के इस क्रूर व्यवहार को देखकर गुस्से में हैं. वे कहते हैं, 'कम से कम यहां तो मुनाफ़ा नहीं कमाना चाहिए.' कपूर आगे कहते हैं कि पुरानी नोट के बदले नई नोट देने का भी धंधा गुलज़ार हो गया है. 1,000 रुपए के बदले 800 या 850 रुपए दिए जा रहे हैं. 500 रुपए के नोट के बदले 400 या 450 रुपए ही मिल पा रहे हैं.

यहां हमेशा जलती रहती है चिता

कपूर कहते हैं कि ऐसा सभी कारोबारियों के साथ नहीं है कि नोटबंदी के मौसम में लकड़ी बेचकर ज़्यादा मुनाफ़ा कमाया जा रहा है. कई कारोबारी और दुखी परिवार आपस में एडजस्ट भी कर रहे हैं. कई कारोबारी तो लकड़ी की तय कीमत से कम भी लेने के लिए तैयार हैं. दुख की इस घड़ी में ऐसे कारोबारियों ने लोगों को कुछ रियायत देना शुरू कर दिया है.

काशी का मणिकर्णिका घाट पूरी दुनिया में मशहूर है. मान्यता है कि यह श्मशान कभी शांत नहीं होता. चिताएं हमेशा जलती रहती हैं और यहां शवदाह किए जाने से मृतक को मुक्ति मिलती है. दूर-दराज के इलाक़ों से भी लोग शवों को यहां लाते हैं. एक अनुमान के मुताबिक यहां लगभग 75-80 शव हर रोज़ जलाने के लिए लाए जाते हैं. 

बदल रहे हालात

एक स्थानीय पत्रकार ने बताया कि छोटे नोटों की किल्लत से शवों का अंतिम संस्कार करने में दिक्कत आ रही हैं लेकिन वह यह भी कहते हैं कि स्थिति अब सामान्य होती जा रही है. यह समस्या 8 नवंबर की घोषणा के अगले दिन काफी जटिल हो गई थी. मृतक के परिजन जब 9 नवबंर को अंत्येष्टि का सामान लेने बाजार गए तो किसी ने उनसे 500 और 1,000 का नोट लिया ही नहीं. उन्हें रिश्तेदार और जाननेवालों से उधार लेकर अंतिम संस्कार करना पड़ा. 

ठीक इसी तरह के हालात लखनऊ के दो श्मशान घाटों भैंसाकुंड और गुल्लाला के भी हैं. मृतक के परिजनों को अंत्येष्टि के लिए साथ आए लोगों से पैसे लेने पड़े.

First published: 16 November 2016, 7:36 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी