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बेकल उत्साही: 'हमारे दिलों की राज्यसभा में वह पहले से थे'

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 11 February 2017, 5:45 IST
(रेख़्ता)

अली सरदार जाफ़री ने अपने लेख में एक बार कहा था, 'हम तरक्क़ीपसंद अदीब रहे हैं मगर बेकल ने यह काम हमसे पहले कर दिया.' बेकल उत्साही की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि अपनी शायरी में मुल्क़ की मिट्टी, गांव और बाज़ारों को दर्ज करने के लिए वह पकी हुई उम्र के मोहताज नहीं थे. 16 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली मुक़म्मल नज़्म लिखी, उनवान था 'बसंत'.

उनकी शुरुआती तालीम ज़िला बलरामपुर (तब गोंडा) के एक मदरसे से हुई. यहां उर्दू और फ़ारसी के उस्ताद क़लीम मोहानी से वह अपने क़लाम पर मश्विरा लेते थे. 8वीं दर्जे की पढ़ाई करते वक़्त 1943 में उन्होंने अपने स्कूल के मुशायरे में पहली बार शिरक़त की. उस शेरी जलसे में शफ़ीक़ जौनपुरी, जोश मलीहाबादी, फ़िराक़ गोरखपुरी जैसी हस्तियां मौजूद थीं और मुशायरे की सदारत और निज़ामत कर रहे थे जिगर मुरादाबादी. 

उनकी पैदाइश मोहम्मद जाफ़र ख़ान और बिस्मिल्लाह बीबी के घर 1 जून 1928 को हुई. 1930 से मुंबई से निकलने वाली एक उर्दू पत्रिका माहनामा शाइर ने जनवरी 2010 में बेकल उत्साही पर एक विशेषांक निकाला. पत्रिका लिखती है, 'जागीरदाराना माहौल में पैदा होने के बावजूद वह ग़रीब-गुरबा पर शेरो-शायरी करने लगे थे और इसी वजह से 1949 में घर से निकाल दिए गए. तब उन्होंने एक स्कूल क़ायम कर बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था, फिर मां बिस्मिल्लाह की मिन्नतों पर 1950 में घर वापस लौटे.' 

आंदोलनकारी

हालांकि इसके बावजूद बेकल जागीरदाराना मिजाज़ के कभी क़ायल नहीं रहे. जब नहरों का पानी इस्तेमाल करने की एवज में किसानों से वसूले जाने वाले कर की उन्होंने पुरज़ोर मुख़ालिफ़त की तो गिरफ़्तार कर जेल भेज दिए गए. 1954 की समाजवादी तहरीक़ में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. 

मुशायरों में जब सिर्फ नज़्में और ग़ज़लें पढ़ी जाने का चलन था, तब बेकल ने अवधी लबो-लहज़े में गीत गाने का रिवाज शुरू किया. आज हर मुशायरे में ऐसे शायर मिलते हैं जो नज़्म और ग़ज़ल से इतर गीत गुनगुनाते हैं. मुशायरों में वह दोहे भी पढ़ा करते थे. 

रज़िया हामिद ने अपने एक मज़मून में बेकल के इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए लिखा था, 'उन्होंने मुक़ामी बोली को अदब का दर्जा देकर ऐसा वक़ी काम किया है कि जिसकी अहमियत का अंदाज़ा आज नहीं तो कल ज़रूर होगा. क्योंकि ये उनका तारीख़साज़ कारनामा है. उनकी शायरी में नज़ीर अक़बराबादी, मीर तक़ी मीर, कबीर और रसखान के लहज़े गले मिलते नज़र आते हैं.' 

कैसे हुए बेकल उत्साही

बेकल का सही नाम मोहम्मद शफ़ी ख़ान है. 1945 में वह ज़ियारत के लिए हज़रत वारिस अली शाह की दरगाह, देवा शरीफ़ पहुंचे थे. कहते हैं कि बेकल ने जब कुछ शरारत की तो दरगाह पर मौजूद शाह हाफ़िज़ प्यारे मियां ने कहा, 'बेदम गया बेकल आया.' इस वाक़ये के बाद से ही उन्होंने अपना नाम बदलकर बेकल वारसी रख लिया. 

1952 में जब पंडित जवाहरलाल नेहरू चुनाव प्रचार के लिए गोंडा पहुंचे तो बेकल ने उनके स्वागत में एक नज़्म 'किसान भारत का' पढ़ी. तब बेकल के अंदाज़ से ख़ुश होकर नेहरू ने कहा था, 'ये हमारा उत्साही शायर है.' इसके बाद से दुनियाभर में उर्दू अदब उन्हें बेकल उत्साही के नाम से जानने लगा और मोहम्मद शफ़ी ख़ान वहीं थम गए. 

जिगर मुरादाबादी अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में गोंडा में अपने बहनोई के पास रह रहे थे. उनके बहनोई असगर गोंडवी भी आला दर्जे के शायर थे. तब बेकल जिगर मुरादाबादी से मुलाक़ात के लिए असगर गोंडवी के घर आने-जाने लगे. जिगर की सोहबत में रहकर उनकी शायरी में थोड़ी बहुत तब्दीली आई.

दिलों पर पहले से काबिज़

वह प्रयोगधर्मी थे. उर्दू अदब के उनके ख़ज़ाने में सिर्फ़ नज़्में और ग़ज़लें नहीं हैं. उन्होंने कुल 19 किताबें लिखीं जिनमें रुबाई, नात, क़तात, गीत और दोहे भी भरपूर हैं. 2007 में बेकल उत्साही का संग्रह कुल्यात-ए-बेक़ल प्रकाशित हुआ जिसकी एक प्रति बेकल ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को मिलकर भेंट की थी. 

बेकल उत्साही की मक़बूलियत पर एक बार गोपीचंद नारंग ने लिखा था, 'आज वो ऐसे शायर हैं कि जिनके बग़ैर हिन्दुस्तान का कोई शेरी जलसा मुक़म्मल नहीं है. पाकिस्तान, कनाडा और अमेरिका में उर्दू की महफ़िल बग़ैर बेकल साहब के लायानी समझी जाती है. हमारे दिलों की राज्यसभा में वह पहले से रुक्न थे मगर फिर राज्यसभा से रुक्न मुंतख़ब हुए.'

देश में क़ौमी एक़ता मज़बूत करने के लिए वह राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए थे. 1976 में उन्हें पदमश्री मिला. उनकी निजी ज़िंदगी बेहद कामयाब रही. बीवी सोहरा ख़ानम से उनका एक बेटा और पांच बेटियां हैं. अंतिम समय में वह अपनी बेटी डॉक्टर सूफ़िया के पास थे. 

First published: 4 December 2016, 7:56 IST
 
शाहनवाज़ मलिक @catchhindi

स्वतंत्र पत्रकार

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