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सपा में वापसी: राम गोपाल की राम कहानी

अतुल चौरसिया | Updated on: 18 November 2016, 7:31 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के कुनबे में वर्चस्व और सत्ता के लिए पिछले तीन-चार महीने में उतार-चढ़ाव वाले कई संघर्ष दिखे हैं.
  • पिछले महीने आन, बान शान की इस लड़ाई में पार्टी के महासचिव रहे प्रोफेसर रामगोपाल यादव को छह साल के लिए निलंबित कर दिया गया था. 
  • मगर महज़ एक महीने के भीतर उन्होंने शानदार ढंग से पार्टी में वापसी की है जिसके पीछे उनकी अपनी लंबी कथा है. 

प्रोफेसर साब की समाजवादी पार्टी में वापसी हो गई है. रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी में इसी नाम से जाने जाते हैं. रामगोपाल पिछले तीन-चार महीनों से समाजवादी पार्टी के भीतर मची रार की भेंट चढ़ गए थे. शिवपाल यादव ने पिछले महीने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधि में शामिल होने का आरोप लगाकर निष्कासित कर दिया था. अब स्वयं राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने उन्हें पार्टी में वापस लिए जाने की घोषणा की है.

इस दौरान दो पालों में बंटी समाजवादी पार्टी के लोगों ने बेलाग-लपेट एक दूसरे के खिलाफ जुबानी तीर चलाए. शिवपाल खेमें में खम ठोंक रहे अमर सिंह ने कहा था कि अगर उनकी हत्या होती है तो इसके लिए रामगोपाल यादव जिम्मेदार होंगे. अब उनके सुर भी बदल गए हैं, अमर सिंह कहते हैं, 'वे (राम गोपाल यादव) अंदर के आदमी हैं, मैं बाहर का. इसलिए मैं कुछ नहीं कहूंगा.'

पार्टी में वापसी के बाद रामगोपाल यादव ने मुलायम सिंह यादव को धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा, 'मैं पार्टी के खिलाफ कभी नहीं था, न ही कभी पार्टी के खिलाफ बयान दिया है. मैं सपा में हूं और सपा में ही रहूंगा.'

बर्खास्तगी के बाद वापसी

दो महीने के भीतर रामगोपाल यादव की सपा में वापसी की कहानी दिलचस्प है. इस दौरान घटी कुछ घटनाएं रामगोपाल के बहिर्गमन और आगमन की गिरहें खोल देती हैं.

14 नवंबर को राम गोपाल यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेस की. इस कॉन्फ्रेंस वो रो पड़े और रोते-रोते कुछ बातें कहीं. उनकी कही बातों के निहितार्थ कई थे. बातों-बातों में उन्होंने पार्टी के संविधान की याद दिलाई. उन्होंने साफ कहा कि उनके निष्कासन का अधिकार सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष को है. या तो मुलायम सिंह यादव उन्हें बाहर निकालें या फिर पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाकर इस पर निर्णय किया जाय.

गौरतलब है कि पार्टी के संविधान के मुताबिक राष्ट्रीय अधिवेशन तीन साल में एक बार होता है और इसमें अभी समय है. लेकिन यदि राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 40 प्रतिशत सदस्य सहमत हो जाएं तो कभी भी राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया जा सकता है.

दिलचस्प बात यह है कि यही 40 फीसदी सदस्य आपात स्थिति में नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन की मांग भी कर सकते हैं. रामगोपाल यादव ने यह बात नहीं कही लेकिन उनके बयान का छिपा संदेश पार्टी समेत तमाम लोग समझ गए.

राम गोपाल यादव सपा का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाने को लेकर आत्मविश्वास से भरे हुए इसलिए भी थे क्योंकि उन्हें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का वरदहस्त प्राप्त है. अपनी कॉन्फ्रेंस में रामगोपाल यादव ने फिर से वही मांग रखी कि चुनाव अखिलेश को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके लड़ा जाय और टिकटों के बंटवारे का अधिकार अखिलेश यादव को दिया जाय.

जिस पार्टी संविधान की ओर राम गोपाल इशारा कर रहे थे उसका संविधान यह भी कहता है कि राष्ट्रीय अधिवेशन के जरिए टिकटों का बंटवारे का अधिकार किसी अन्य नेता को भी दिया जा सकता है, प्रदेश का अध्यक्ष चाहे कोई हो. इशारों में कही गई बात ने राम गोपाल का काम कर दिया.

हाशिए पर जाते शिवपाल

14 नवंबर को इटावा में राम गोपाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने परिवार के भीतर पैदा हुई दरार का पलड़ा उनके पक्ष में झुका दिया था. मुलायम कुनबे के अधिकांश सदस्य उस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे. मुलायम सिंह यादव के पोते तेज प्रताप यादव वहां मौजूद थे. तेज प्रताप मुलायम सिंह की परंपरागत सीट मैनपुरी से सांसद हैं. परिवार के एक और सदस्य अंशुल यादव भी कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे. इसके अलावा इटावा के एमएलसी भी वहां मौजूद थे.

इससे एक बात साफ हो गई कि वर्चस्व की इस लड़ाई में परिवार के ज्यादातर सदस्य अखिलेश-रामगोपाल के पक्ष में हैं. शिवपाल यादव धीरे-धीरे हाशिए पर जा रहे हैं.

उठापटक के बीच हाल ही में हुई पार्टी के रजत जयंती समारोह में भी शिवपाल की पराजय का संकेत मिल गया था. वहां अखिलेश ने मंच से चुटकी ली लेकिन शिवपाल ने हर अपमान सहकर भी अखिलेश को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया.

उस आयोजन के जरिए शिवपाल की मंशा बिहार की तर्ज पर महागठबंधन खड़ा करने की थी. शिवपाल दिन रात एक कर सभी बिछड़े समाजवादियों को एक मंच पर लाकर गठबंधन की हिमायत कर रहे थे. इसी नीति के तहत उन्होंने कौमी एकता दल का विलय करवाया था. अखिलेश लगातार इसका विरोध कर रहे थे.

मुलायम की हुंकार

अंत में मुलायम सिंह यादव ने अंतिम बयान देकर शिवपाल का गठबंधन का सपना तोड़ दिया. 10 नवंबर को उन्होंने कहा, 'समाजवादी पार्टी चुनाव में अकेले लड़ेगी. जिन्हें हमारे साथ लड़ना है वो अपनी पार्टी का सपा में विलय कर दें.'

इस निर्णायक हार के बाद शिवपाल ने चुप्पी साध ली. इसी बीच संसद का शीतकलीन सत्र सिर पर आ गया. राज्यसभा में बिना नेता के पार्टी रह नहीं सकती थी. इस समस्या से निपटने के लिए मुलायम सिंह के सामने दो नाम आए थे नरेश अग्रवाल और बेनी प्रसाद वर्मा का. पर पार्टी सूत्रों के मुताबिक मुलायम सिंह ने दोनों के ही ऊपर भरोसा करने से इनकार कर दिया. नरेश अग्रवाल का राजनीतिक अतीत दल बदलुओं का है जबकि बेनी प्रसाद वर्मा अभी-अभी पार्टी में वापस आए हैं.

परिवार के करीबी सूत्रों का कहना है कि सदन में नेता के पद के साथ तमाम विशेषाधिकार जुड़े होते हैं. तमाम स्तर पर पक्ष और प्रतिपक्ष से पार्टी संसदीय दल का नेता ही डील करता है, इसमें फ्लोर मैनेजमेंट से लेकर तमाम तरह के समझौते और अंदरूनी राजनीति शामिल है. मुलायम सिंह ने ऐसे महत्वपूर्ण पद पर किसी बाहरी व्यक्ति की बजाय परिवार के ही किसी व्यक्ति पर भरोसा करना ज्यादा मुनासिब समझा. इस दिशा में एक और भूमिका अखिलेश यादव की भी रही. वो लगातार राम गोपाल चाचा की वापसी का दबाव बनाए हुए थे.

इन स्थितियों में राम गोपाल एक बार फिर से सपा में वापसी कर राज्यसभा में सपा के संसदीय दल के नेता के रूप में पदस्थापित हो चुके हैं. परिवार की लड़ाई खत्म हुई हो या न राम गोपाल यादव का वनवास समाप्त हो गया है. शिवपाल यादव फिलहाल हारे हुए खिलाड़ी नजर आ रहे हैं.

First published: 18 November 2016, 7:31 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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