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सहारनपुर ग्राउंड ज़ीरो: ऐसे पुलिस के हाथ से निकली बात और बिगड़े हालात

सादिक़ नक़वी | Updated on: 26 May 2017, 11:36 IST
पीटीआई फोटो

सहारनपुर में भड़की हिंसा के मामले में सरकारी अधिकारियों का मानना है कि प्रशासन की तरफ से ढिलाई बरती गई, हालांकि वे यह भी कह रहे हैं कि ये हिंसक घटनाएं किसी बाहरी ‘साजिश’ का नतीजा है. दलित-ठाकुर जातिगत हिंसा के शिकार सहारनपुर में गुरुवार को कोई नई वारदात नहीं घटी. 5 मई से लगातार जारी इन हिंसक घटनाओं पर गृह मंत्रालय ने रिपोर्ट तलब की है. हिंसक वारदातों में अब तक तीन लोगों की जानें गई हैं और 24 से ज्यादा घायल हुए हैं.

गृह सचिव ने क्या कहा

हालात को सही ढंग से न संभाल पाने के लिए प्रशासन को आलोचना का शिकार होना पड़ा है और इससे भाजपा सकते में है. वरिष्ठ अधिकारियों के साथ जिले में कैम्प कर रहे गृह सचिव मणि प्रसाद मिश्रा ने संवाददाताओं से कहा, "जांच में पाया गया कि इन वारदातों के पीछे नापाक इरादों वाले बाहरी तत्वों का हाथ है. एक बार पक्का सबूत मिल जाए तो प्रशासन विस्तार से इस बारे में कुछ जानकारी दे सकता है. इन हिंसक वारदातों की वजह सामाजिक वैमनस्य नहीं है."

हालांकि उन्होंने इन बाहरी तत्वों और उनके बारे में कोई खास जानकारी नहीं दी. उन्होंने स्पष्ट किया कि किस प्रकार प्रशासन हालात को संभाल पाने में नाकाम रहा. इसीलिए सरकार ने तुरंत ही शीर्ष पदों पर बदलाव किए हैं. एसएसपी एससी दुबे और जिला मजिस्ट्रेट एनपी सिंह को निलम्बित कर दिया गया. जाहिर है सरकार की कथनी और करनी में फर्क नहीं है. राज्य सरकार द्वारा सभी वर्गों के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था कि सरकार सभी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करेगी.

 

एकतरफ़ा प्रशासन

क़ानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि प्रशासन ने एकतरफा भूमिका निभाई है, यह धारणा बलवती होती दिखाई दे रही है. स्थानीय पुलिस के हाल तो तभी से खराब हैं, जब अप्रैल में भाजपा सांसद राघव लखनपाल ने अपने साथियों के साथ यहां के एसएसपी लव कुमार के घर के बाहर इकठ्ठा होकर उनका रास्ता अवरुद्ध कर दिया था और एफआईआर दर्ज होने के बावजूद गिरफ्तारी से बचने में कामयाब रहे.

ठाकुर और दलित दोनों ही वर्ग प्रशासन पर पक्षपाती होने का आरोप लगा रहे हैं. उनका कहना है कि पुलिस मनमानी कर रही है और लोगों को गिरफ्तार करने से पहले उनकी भूमिका के बारे में पता लगाना जरूरी नहीं समझ रही. पुलिस ने स्वीकारा है कि ऐसा हो सकता है, क्योंकि हम पर दबाव था कि मामले में कार्रवाई की जाए और उसके नतीजे सामने आने चाहिए मिश्राा ने कहा कि अगर कोई ग़लत गिरफ्तारियां हुई हैं तो उन्हें रिहा कर दिया जाएगा.

गुरुवार को शब्बीरपुर दौरे के वक्त मिश्रा और उनके साथी अधिकारियों को यहां के ठाकुरों के गुस्से का शिकार होना पड़ा. उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह ठाकुरों के पीछे पड़ी है.

 

एक पुलिस अफसर ने कैच से कहा कि मायावती को शब्बीरपुर दौरे की इजाज़त देना साफ़ तौर पर गलत निर्णय था.

शब्बीरपुर के राजकुमार चौहान ने सवाल किया कि मायावती के दौरे के बाद 23 मई को जब दलित हमारे गांव में उत्पात मचा रहे थे, तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया? क्या यह भेदभाव नहीं है? मिश्रा और अधिकारियों को उन्होंने एक वीडियो क्लिप भी दिखाई, जिसमें दलित उनके गांव के ठाकुर मोहल्ला से गुजरते हुए नारे लगाते दिख रहे हैं. चौहान ने कैच से कहा, "उन्हें इसी सड़क से निकलने की क्या ज़रूरत थी, जबकि उनके पास अलग रास्ता भी था. वे हमारे सामने शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे और पुलिस ने उन्हें इसकी पूरी छूट दे रखी थी."

इस बीच, एक दलित सुगन ने कहा, "पुलिस को हमारी कोई फिक्र नहीं है. वो हमारी सुनते ही नहीं और क्यों सुनें? राज्य में भाजपा की सरकार जो है." दलितों के जले हुए घरों की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "वे हमारी परवाह नहीं करते. ठाकुरों ने उसका एक कमरे का घर भी 5 मई को जला दिया था. पुलिस ने स्थिति को ठीक से नहीं संभाला."

एसएसपी और डीएम के निलंबन के बाद नए अधिकारियों ने कामकाज संभाल लिया है. जिले में तैनात एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि पुलिस हालात का जायजा ठीक से नहीं ले पाई. हो सकता है निलम्बित प्रभारी ने स्थानीय मुखबिरों की बातों को गंभीरता से नहीं लिया और उसे अधिक महत्व नहीं दिया. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का दावा है कि एसएसपी दुबे ने स्थानीय गुप्तचर इकाई की बातों पर ध्यान नहीं दिया और उन पर भरोसा नहीं किया. इससे हालात की गंभीरता नहीं भांप सके. एक अधिकारी ने बताया कि दुबे ने कभी किसी सूचना पर गौर किया ही नहीं. यहां तक कि 5 मई को भड़की हिंसा के बाद गिरफ्तारियां करने के लिए उन्हें तुरंत नहीं जाने दिया गया.

एक अन्य पुलिस अधिकारी ने माना हालात काबू से बाहर नहीं होते अगर प्रशासन ने शब्बीरपुर में मायावती के दौरे और सैकड़ों लोगों के इकट्ठा होने की इजाजत ना दी होती. 5 मई को ही शब्बीरपुर में जातीय हिंसा भड़की थी. पुलिस अफसर ने कैच से कहा, "साफ तौर पर यह गलत निर्णय था, पता नहीं क्या सोच कर माया के दौरे की इजाज़त दे दी गई." अन्य पुलिस अधिकारियों का कहना है कि एसएसपी दुबे ने माया के प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर स्थानीय जांच एजेंसियों से कुछ भी नहीं पूछा और अनुमति दे दी.

क्या कांग्रेस का हाथ है?

हालांकि स्थानीय भाजपा नेता इन हिंसक घटनाओं के लिए लगातार मायावती और बसपा को दोषी ठहरा रहे हैं. लेकिन जांच अधिकारी इन वारदातों के पीछे कांग्रेस की भूमिका की भी जांच कर रहे हैं. 9 मई को घटी हिंसक वारदातों के दूसरे चरण और उसके बाद 23 मई की वारदातों में भीम सेना का साथ देने में कांग्रेस की भूमिका की जांच की जा रही है.

एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि इमरान मसूद जैसे स्थानीय कांग्रेस नेताओं के अलावा ऐसी कोई संभावना नहीं है और वे भी बस भीम सेना प्रमुख को साथ देने का वादा मात्र कर सकते हैं. गौरतलब है कि शहर में हिंसक वारदातों वाले तीनों दिन मसूद शहर में ही नहीं थे. स्थानीय लोगों का कहना है कि मायावती के शब्बीरपुर दौरे के बाद भड़की हिंसा में एक मुस्लिम व्यक्ति के घायल पाए जाने के बाद 23 मई को भीम सेना ने बहुत से प्रभावी मुस्लिमों से सम्पर्क साधा.

9 मई को स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों पर हमला करने के आरोप में भीम सेना के करीब 100 कार्यकर्ता वांछित हैं. पुलिस अब तक भीम सेना प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ को भी गिरफ्तार नहीं कर पाई है, जिन्हें हाल ही नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर देखा गया. ना ही कोई उम्मीद है कि उन्हें जल्द गिरफ्तार किया जाएगा.

एडीजी, कानून-व्यवस्था आदित्य मिश्रा ने शब्बीरपुर में कैच से कहा, "फिलहाल हमारी प्राथमिकता हालात पुनः सामान्य करने की है. उनकी गिरफ्तारी की जल्द कोई संभावना नहीं हैं क्योंकि हम अभी तक साक्ष्य जुटाने में ही लगे हैं."

 

राजनीतिक साजिश तो नहीं?

राज्य सरकार इन वारदातों में कहीं न कहीं गैर बसपा दल का हाथ होने से भी इनकार नहीं कर रही. कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा, "जांच में पाया गया है कि कुछ लोग प्रदेश की राजनीति में मायावती और उनकी पार्टी का स्थान लेने की कोशिश कर रहे हैं, जो हाल ही में संपन्न चुनावों में पूरी तरह से विफल रहीं." हालांकि उन्होंने कांग्रेस का नाम नहीं लिया.

एक अन्य पुलिस अधिकारी ने कहा फिलहाल इसे राजनीतिक साजिश कहना जल्दबाजी होगी. कुछ हो जाता है तो राजनीतिक पार्टियां अपने फायदे के लिए उसमें कूद पड़ती हैं. कई पुलिस अधिकारियों ने कैच से कहा, "मायावती के शब्बीरपुर दौरे वाले दिन भीम सेना ने ठाकुरों को उकसाया था, भड़काऊ नारे लगाते हुए उनके घरों पर पथराव किया. बसपा का हाथ होने या उसके द्वारा भीम सेना को समर्थन देने के संबंध में फिलहाल कोई साक्ष्य नहीं है. जांच में बसपा के एक विधायक का नाम जरूर सामने आया है." पुलिस का कहना है कि उनकी भूमिका मात्र इतनी ही है कि वे एक-दो सभाओं में नजर आए थे.

 

युवाओं का आक्रामक रवैया

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "क्षेत्र में व्याप्त जातीय तनाव दोनों पक्षों के युवाओं के अक्रामक रुख का नतीजा है. इन दिशाहीन युवाओं को काबू में करना काफी मुश्किल है."

बडगांव के एक स्कूल के रिटायर्ड प्रिंसिपल राजकुमार ने कहा, "जब से भाजपा सत्ता में आई है ठाकुर समुदाय के छोटे-छोटे लड़के काफी आक्रामक हो गए हैं. कुछ को तो लगता है जैसे उनका ही राज हो और वे दलितों और मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं." उनके गांव चंद्रपुर में 23 मई को हुई हिंसा में एक मौत हो गई, जब शब्बीरपुर से लौट रहे दलितों पर घात लगाकर हमला किया गया.

एक शीर्ष पुलिस अधिकारी ने कहा, "दोनो पक्षों में से एक (ठाकुर) तो सदा से ही दबंग रहा है, जबकि दूसरा (दलित) राजनीतिक अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है." उन्होंने कहा, "सहारनपुर में दलितों की आबादी अधिक होने के चलते यह क्षेत्र राज्य के अन्य इलाकों के मुकाबले काफी संवेदनशील है."

जिले में फिलहाल अशांति व्याप्त है. जिला प्रशासन को उम्मीद है कि सब ठीक हो जाएगा, लेकिन शब्बीरपुर में ठाकुर समुदाय के एक युवा का बयान चिंताजनक है. उसने कहा, "अब हालात पर नियंत्रण करना मुश्किल है, क्योंकि बहुत से गांवों में तनाव फैल चुका है. आप जनता का विश्वास फिर से कैसे हासिल करोगे?"

First published: 26 May 2017, 11:36 IST
 
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