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राजस्थान के इस शहर में है सास-बहू मंदिर, नाम ही नहीं इसकी कहानी भी है थोड़ी सी हटके

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 November 2021, 10:58 IST

कई बार कुछ नामों को सुनकर या पढ़कर हमें बहुत अजीब सा लगता है और फिर उस नाम के पीछे के रहस्य या कहानी को जानने की इच्छा हम सभी के मन में होती है. अगर आपसे कहा जाए कि हमारे देश के लाखों मंदिरों में से एक सास-बहू का मंदिर भी है तो यकीनन आपको ये पढ़कर बहुत ही अजीब सा लगेगा कि आखिर सास-बहू का मंदिर भी होता है क्या? अगर ऐसा है तो ये कहां है इसके पीछे की कहानी क्या है? इस तरह से कई सवाल आपके मन में उठने लगेंगे. तो चलिए आपको आज हम सास-बहू के के मंदिर के बारे में ही बताते हैं. ये मंदिर जितना नाम से अनोखा है उतना ही इसकी कहानी भी रोचक है.

दरअसल, राजस्थान के उदयपुर शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर एक अत्यंत कलात्मक और ऐतिहासिक मंदिर है, जिसे सास बहू मंदिर के नाम से जाना जाता है. हालांकि इस मंदिर का असली नाम सहस्रबाहु मंदिर है. लेकिन लोग इसे सास बहू मंदिर के नाम से ही जानते हैं. इस मंदिर का निर्माण ग्यारहवीं सदी की शुरआत में किया गया था. ये मंदिर विकसित शैली और बेहतरीन अलंकरण के लिए जाना जाता है. मंदिर का परिसर 32 मीटर लंबा और 22 मीटर चौड़ा है. इस मंदिर का निर्माण कछवाहा वंश के शासक महिपाल ने करवाया था. महिपाल भगवान विष्णु का भक्त था. कहा जाता है कि उसने ये मंदिर अपनी पत्नी और बहू के लिए बनवाया.


इसलिए इस मंदिर का नाम सास बहू का मंदिर रखा गया. इस मंदिर का निर्माण ऊंचे जगत पर किया गया. इसमें प्रवेश के लिए पूर्व में मकरतोरण द्वार है. वहीं मंदिर पंचायतन शैली में बनाया गया है. मुख्य मंदिर के चारों तरफ देवताओं का कुल बसता है. हर मंदिर में पंचरथ गर्भगृह, खूबसूरत रंग मंडप बनाए गए हैं. सास बहू यानी सहस्रबाहु मंदिर मूल रूप से भगवान विष्णु को समर्पित है. इसके अलावा मंदिर परिसर में दूसरा प्रमुख मंदिर भगवान शिव का है. इन मंदिरों में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, राम, कृष्ण, बलराम सभी विराजते हैं.

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मंदिर के प्रवेश द्वार पर मां सरस्वती की मूर्ति लगाई गई है. मंदिर की दीवारों पर अंदर और बाहर खजुराहो के मंदिरों की तरह असंख्य मूर्तियां बनाई गई है. इन मूर्तियों में कई कामशास्त्र से भी जुड़ी हुई हैं. इस मंदिर की कला को देखकर यहां आने वाले पर्यटक घंटों देखते रहते हैं. बता दें कि  सास बहू मंदिर ने कई हमले भी हुए. जिसके चलते मंदिर का काफी हिस्सा टूट गया. इस मंदिर में सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक दर्शन किए जा सकते हैं. इस मंदिर में अब पूजा नहीं होती. सैकड़ों की संख्या में हर दिन विदेशी सैलानी भी इस मंदिर की वास्तुकला को निहारने के लिए पहुंचते हैं.

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First published: 18 November 2021, 10:58 IST
 
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