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व्यंग्य: 'बबली कोई पहली बकरी नहीं है, शाकाहारी राष्ट्रवादियों ने भी हमें निराश किया है'

साहिल भल्ला | Updated on: 15 February 2016, 8:48 IST

अगर आप एक न्यायाधीश के बगीचे में हैं तो फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन हैं. आप सिर्फ और सिर्फ घुसपैठिए हैं. बीती 9 फरवरी को एक व्यक्ति और एक बकरी (आगे हम उसे उसके असली नाम बबली से ही संबोधित करेंगे) को यही सीख बहुत बुरी तरह मिली. बबली और उसके मालिक हसन को एक न्यायाधीश के अहाते में 'अवैध घुसपैठ' के लिए गिरफ्तार कर लिया गया. यह घटना छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में घटी.

बबली पर जिन धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है उसमें दो से सात साल तक की कैद के साथ जुर्माने का भी प्रावधान है. हालांकि फिलहाल बबली जमानत पर है. बकरी के मालिक हसन भी जमानत पर हैं. यह शिकायत कोरिया जिला के मजिस्ट्रेट हेमंत रात्रे के माली ने दर्ज करायी थी.

पुलिस ने अपनी रपट मे कहा है कि बबली सीरियल अफेंडर है यानि की वह अतीत में भी लगातार इस तरह के अपराध में लिप्त रही है. जज साहब के माली के मुताबिक उसने बबली और उसके मालिक को कई बार पहले भी चेतावनी दी थी. बबली जब-तब बगीचे में घुसकर घास, पौधे, फूल और सब्जियों को नुकसान पहुंचाती थी. जज साब को अपने प्यारे दलान में बबली की ये कार्रवाइयां नागवार गुजरीं सो उन्होंने बबली समेत उसके मालिक की गिरफ्तारी का परवाना जारी कर दिया.

बबली ने टाइम्स नाऊ चैनल पर न्यूजऑवर में अर्नब गोस्वामी की को-होस्ट बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है

इस गिरफ्तारी पर अब राजनीति भी शुरू हो गई है. कांग्रेस पार्टी के नेता शैलेश नितिन त्रिवेदी का कहना था, "बबली की गिरफ्तारी हास्यास्पद है. छत्तीसगढ़ पुलिस कानून का मजाक बना रही है. जबकि गंभीर अपराधों के आरोपी खुले घूम रहे हैं."

इस घटना ने बबली के स्वजातियोंं को भी गुस्से से भर दिया है. घटना से नाराज बकरी समुदाय के अनौपचारिक प्रवक्ता अबू बकरा ने एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में इस घटना के प्रति अपनी नाराजगी जतायी है साथ ही बकरी समुदाय के साथ लंबे समय से हो रहे भेद-भाव को भी उठाया है. इस मौके पर आकर उन्होंने बकरियों के साथ इस देश में ऐतिहासिक अन्याय होने की बात भी कही. अबू बकरा ने भारतीय बकरी समाज के तमाम ज्वलंत राजनीतिक मुद्दों पर बेबाकी से बात की.

हम आपके सामने बिना काट-छांट के उनका यह साक्षात्कार प्रस्तुत कर रहे हैं.

पूरा देश छत्तीसगढ़ राज्य बनाम बबली बकरी का फैसला आने का इंतज़ार कर रहा है. मीडिया में बबली का हैशटैग चल रहा है. आप इसे कैसे देखते हैं?

इस देश में हमेशा से बकरी समाज हाशिए पर रहा है. हमें हमेशा दबाया गया. यह मामला भी अलग नहीं है. इसके पीछे गाय माफिया की साजिश भी हो सकती है. हमें गालियां देने और असमाजिक तत्व के रूप में प्रचारित करने के लिए गाय समाज लंबे समय से ऐसी साजिशें करता आया है.

आप देखिए आज देश में हिंदुत्व के उदय के साथ ही गायोंं ने राज्य से अपनी नजदीकी का फायदा उठाकर गोहत्या को पाप घोषित करवा लिया. कभी किसी ने सोचा इसका खामियाजा कौन उठा रहा है. हम बकरे-बकरियां इसका सबसे बड़ा खामियाजा उठा रहे हैं. बीफ की जगह लोगों ने मटन पर धावा बोल दिया है. हमारा दुख सुनने वाला कोई नहीं. गायों के पाप को हम क्यों भुगतें?

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बकरी होना तो गाली हो गया है, बात-बात में ब्लैक शीप कहके हमें निशाना बनाया जाता है. बबली के मामले में भी यही हुआ. वह तो काली होने के साथ मुसलमान भी है लिहाजा उसे निशना बनाना और भी आसान हो गया. आज हालत यह हो गई है कि हम बकरों को हर मौके पर बलि का बकरा बनाया जाता है. बबली का अपमान तो राष्ट्रीयता का अपमान है. देशभक्ति और स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान है.

बबली की गिरफ्तारी स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान कैसे है? आप इसे जरा खुलके समझाएंगे?

आपको पता है महात्मा गांधीजी हमेशा बकरी का दूध पीते थे. इसके लिए उनके पास हमेशा दो-चार बकरियां साबरमती आश्रम में पड़ी रहती थीं. बबली की नानी भी उनमें से एक थी. बबली की नानी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लगातार गांधीजी को दूध पिलाया था. और आज उनके परिजनों को देश में ये दिन देखने पड़ रहे हैं. मेरी अपील है कि मोदीजी जो खुद भी गुजरात से आते हैं, बबली को स्वतंत्रता सेनानी कोटे से पेंशन की घोषणा करें.

भारत में बकरी समाज के प्रवक्ता के रूप में आपके सामने किस तरह की चुनौतियां पेश आती हैं?

यह बहुत मुश्किल काम है. भारत से हमारा जुड़ाव ऐतिहासिक है. हजारों साल पहले हमारे पूर्वजों ने सुना कि भारत एक शाकाहारी मुल्क है. लिहाजा हमारे पुरखों ने इसे आपनी मातृभू और पुण्यभू के रूप में चुना. वे यहां आकर बसे, यहां की सभ्यता संस्कृति में अपना योगदान दिया. लेकिन आज हमारी दशा यहां बंदी के समान है. जिसे देखो हमारे गले में पट्टा बांध के रखता है.

हमारे बच्चों का भोजन हमसे छीन लिया जाता है. हर दिन हमें अपने सगे-संबंधियों को खोना पड़ रहा है. बीफ पर प्रतिबंध के बाद मानो बकरी समाज पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है. किसी को तो हमारे अधिकारों के लिए बोलना था. इसलिए अतीत की बेड़ियां तोड़कर हमें सामने आना पड़ा. बकरी समाज ने तय कर लिया है कि किसी की प्लेट पर मटन के रूप में पेश होने से अच्छा है कि समुदाय के हक के लिए मरा जाए.

एनडीटीवी का एक लेख कहता है कि बबली सीरियल अफेंडर है यानि वह बार-बार जानबूझकर अपराध कर रही है. क्या यह गलत नहीं है?

बबली उस व्यापक व्यवस्थागत भेदभाव का शिकार है जो मौजूदा समाज ने बकरियों के खिलाफ बना रखा है. वो एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखती है और उसे अपनी जिंदगी अपनी तरह से जीने के अवसर भी उपलब्ध नहीं हैं. आप देखिए कि तंत्र किस तरह से हमें बबली बनने के लिए मजबूर करता है. पहले हमारे बच्चों का खाना यानी हमारा दूध हमसे छीन लिया जाता है और जब हम अपने परिवार के भरण पोषण के लिए दूसरे विकल्प यानी घास-फूस पर मुंह मारते हैं तो हमें इस तरह अपराधी बना कर गिरफ्तार कर लिया जाता है.

हमारे लिए तो वनाधिकार कानून भी नहीं है जहां जाकर हम सुकून से दो गांठ हरी घास खा सकें. बबली की समस्या को बकरी समाज के व्यापक बकराधिकार संदर्भ में देखने की दरकार है. केवल यह कह देना कि वह आदतन अपराधी है एक बार फिर से हमारी वास्तविक समस्याओं से मुंह मोड़ना होगा. इस देश में एक सरकार है जो सबका साथ, सबका विकास करने का दावा करती है लेकिन देश की लाखों की बकरी जनसंख्या को बुनियादी खाद्य सुरक्षा तक प्रदान नहीं कर सकती. 

आरोप लग रहे हैं कि आप लोग बबली की आड़ में खुद राजनीति कर रहे हैं और मौजूदा मोदी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं? क्या बबली का कोई वामपंथी या नक्सली झुकाव अतीत में रहा है?

मैं चुनौती देता हूं, अगर कोई साबित कर दे कि हमारा नक्सलियों से संबंध है तो मैं राजनीति से सन्यास ले लूंगा. उल्टे हम दोनों तरफ से पिस रहे हैं. नक्सली अपनी बलि परंपरा में हमें मार रहे हैं तो सरकार रोजाना पार्टियों में अपने मुंह के स्वाद के लिए हमें काट रही है.

आजतक कोई भी पार्टी बकरी समाज के समर्थन में आगे नहीं आई है, यह अपने आप में इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि हम पूरी तरह से अराजनैतिक हैं. हां हममें और नक्सलियों में कुछ चीजें समान है, जैसे हम राजनीतिक रूप से बेदखल रहे वैसे ही नक्सली भी बेदखल हैं. हमें भी व्यवस्था ने जमकर दूहा है और नक्सलियोंं के नदी-पर्वत-जंगलों को भी जमकर दूहा जा रहा है. कभी हमारी बलि देवी-देवता के नाम पर दी जाती है तो कभी नक्सलियों की बली विकास के नाम पर दी जाती है.

लेकिन हम नक्सलियों से एक मामले में पूरी तरह अलग हैं. हम अहिंसक हैं. बकरी समाज महायान बौद्ध का अनुयायी है, अहिंसा एवं शाकाहार के सख्त नियमों का पालन करता है जबकि नक्सली हिंसा में विश्वास करते हैं.

बकरी समाज देश में किस तरह की राजनीतिक व्यवस्था चाहता है?

राजनीति भेड़ों के लिए है. हम बकरियां हैं, भेड़चाल में नहीं फंसते.

हम बबली पर लौटते हैं. क्या वह मोदीभक्त है?

असल में बबली भाजपा द्वारा 2014 चुनाव के लिए इस्तेमाल किए गए अच्छे दिन अभियान के गीत की गायिका थी. आपको याद होगी वह मिमियाती आवाज- अच्छे दिन आने वाले हैं. कह सकते हैं कि वह मोदी की समर्थक थी. खुद प्रधानमंत्री भी शाकाहारी थे लिहाजा बबली को उनसे उम्मीदें भी बहुत थी. लेकिन सत्ता में आने के बाद उसकी उम्मीदें टूट गई हैं. प्रधानमंत्री ने सत्ता में आने के बाद सारा ध्यान सिर्फ गायों की ओर लगाया. आज बकरी समाज और बबली को लगता है कि उनके साथ नाइंसाफी हो गई है.

क्या बकरियों को मटन बिरयानी जैसे अत्याचार से बचाया जा सकता है?

मटन बिरयानी हमारे समाज के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा है और निकट भविष्य में यह हल होता नहीं दिख रहा. इस समस्या की जड़ सदियों पुरानी है. हमें आज मनुष्यों के अधिक से अधिक संवेदनशीलता की जरूरत है. बकरियों की एक शीर्ष सम्मानित संस्था ने सभी सरकारी स्कूलों में बकरी इतिहास और पशु क्रूरता पर एक अनिवार्य पाठ्यक्रम का प्रस्ताव भी रखा था. पर आज तक इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई.

देश में असहिष्णुता की बहस चल रही है. बकरी समाज भी इस असहिष्णुता का शिकार है?

हमेशा से हमें प्रताड़ित किया जाता रहा है. हजारों साल से हम सामूहिक संहार का शिकार होते रहे, बकरों-भेड़ों की हिंसात्मक रूप से बलि चढ़ाई जाती रही है. यहां तक की ब्लैक शीप के नाम से आपकी शब्दावली में ऐसे शब्द शामिल हो चुके हैं जो पूरी तरह से नस्लवादी और अपमानजनक है.

यह शर्मिंदगी वास्तविक समस्या बन चुका है. यह पूरी नस्ल का चरित्र हनन है. यह केवल हमें इंसानों से अलग करने के लिए किया गया है. आजकल मुझे लोगों को बताने से यह डर लगता है कि मैं बकरा हूं. यह वास्तविक असहिष्णुता है.

बाकी देश के बकरा समाज से क्या प्रतिक्रिया आई है. क्या वहां से भी बबली के समर्थन में प्रदर्शन होगा?

कई देशोंं से प्रतिक्रियाएं आई हैं. बांग्लादेश की बकरियां पहले से ही बबली तक पहुंच चुकी हैं. वे नए और एक समान चराई अधिकार अभियान के लिए जागरूकता बढ़ाने के इरादे से एक फोटोशूट कराना चाहती हैं. बबली का इरादा एक नायिका बनने का कभी नहीं था. लेकिन उसने कहा है कि वह बकरी विरोधी अत्याचार की इस बीमारी को समाप्त करने के लिए कुछ भी करेगी. आखिर में बकरी को ताकत बकरी से ही मिलेगी.

बकरियां अपने बच्चों को किड्स क्यों कहती हैं? और क्या वे उपनाम (सरनेम) का प्रयोग करते हैं?

बकरियां हमेशा अपने बच्चों को 'बच्चे' (किड्स) बुलाती रही हैं. यह तो इंसान हैं जिन्होंने हमारी नकल की. 

कहा जा रहा है कि बबली सलमान खान की एक प्रशंसक है और वह बिग बॉस के अगले सीजन में आ सकती है?

बबली सलमान खान की एक बड़ी प्रशंसक है लेकिन वह पहले से ही कई बाध्यताओं की वजह से बिग बॉस के अगले सीजन में नहीं आ पाएगी. उसने पहले से ही टाइम्सनाऊ चैनल पर आने वाले न्यूजऑवर में अर्नब गोस्वामी की को-होस्ट बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है. बबली को पूरा भरोसा है कि वह समाचार और बहस दोनों का स्तर बढ़ाने में सक्षम सिद्ध होगी.

क्या बलि का बकरा शब्द के अनुचित उपयोग के बारे में आक्रोश व्यक्त करने के लिए यह एक अच्छा समय है?

बकरी आज गाली बन गई है. हमें भेड़ों के साथ रख दिया जाता है. क्या कोई गायों को भैंसों के साथ रखने की हिमाकत कर सकता है. जब बात बकरी पर आती है तो इतना अपमानजनक रवैया अपनाया जाता है. धार्मिक रिवाजों में हम सामूहिक संहार से पीड़ित होते आए हैं. मुझे उम्मीद है कि बबली को न्याय मिलेगा और यह एक मिसाल बनेगा. भविष्य में मनुष्य और बकरियों के बीच एक सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व स्थापित करने के लिए बबली को न्याय दिलाना बहुत जरूरी है. #Justice4Babli

First published: 15 February 2016, 8:52 IST
 
साहिल भल्ला @IMSahilBhalla

Sahil is a correspondent at Catch. A gadget freak, he loves offering free tech support to family and friends. He studied at Sarah Lawrence College, New York and worked previously for Scroll. He selectively boycotts fast food chains, worries about Arsenal, and travels whenever and wherever he can. Sahil is an unapologetic foodie and a film aficionado.

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